सई नदी की करुण कथा : पौराणिक और ऐतिहासिक नदी मर रही है

आर्थिक गैरबराबरी को ख़तम करने के लिए आर्थिक संसाधनों का समुचित वितरण हो

अश्विनी कुमार ‘सुकरात’-


ताजा आकड़ों से पता चला है कि जीडीपी ग्रोथ रेट 7.1% प्रतिशत है..और रोजगार दर / एम्पलायमेंट रेट 1% .. संगॉठित क्षेत्र में तो यह नेगेटिव ही रही है. तो साफ दिख रहा है रोजगार नहीं बढ़ रहा है.  आर्थिक गैरबराबरी को ख़तम करने के लिए आर्थिक संसाधनों का समुचित वितरण हो. एससी एसटी को जो आरक्षण है , वह उनती जनसंख्या के अनुपात में ही है. मतलब 7-8% की एसटी आबादी और 18 % की एससी आबादी और 7% 16% का इनका आरक्षण और इस प्रपोसन या उससे कही कम एससी एसटी आरक्षण है. एसटी के आरक्षण का फायदा अधिकतर मीणाओं ने उठाया.  अभी भी एसटी के आरक्षण का फायदा तो दूर इन जनजातियों में गरीबी बढ़ी है. सरकारी आकड़ों के हिसाब से आदिवासी इलाकों में जिस तरह से जंगल और संसाधनों का दोहन हुआ.  उनका नतीजा है कि उनका पारम्परिक रेजगार ख़त्म हो गया है. जैसा कि आपने बेगा जनजाति के बारे में कृष्ण कुमार वाली सीडी में सुना होगा कि शिक्षा परिवेश से कटी होने के कारण वे औपचारिक शिक्षा में पिछड़ रहे है. जबकि अनौपचारिक रूप से उनके पास एक बेहतर मैडिसीनल नौलेज/ज्ञान है. ऐसा ही एक साक्ष्य मैंने अपनी पुस्तक में आचार्य दीपक के आदिवासियों पर किए अध्ययन से लिया है.
हमारी शिक्षा व्यवस्था सबको समान अवसर नहीं देती. यह अधिक अंग्रेजीदां, अधिक उच्च शहरी- अंग्रेजीदां है, चुकी यह पहले ही उच्च वर्णीय है तो शिक्षा का स्वरूप भी उच्च वर्णीय – उच्च वर्गीय – अंग्रेजीदां है. जिसका फायदा आर्थिक रूप से संपन्न शहरी लोग ही ले रहे है. अतः आरक्षण का फायदा भी इन जातियों की आर्थिक रूप से संपन्न लोगों तक सिमट कर रह गया है. मैं खुद सामान्य श्रेणी में आता हूँ..पारिवारिक रूप से भूमिहार ब्राह्मण से हूँ. पर इसमें न तो कोई मेरी योग्यता है न मेरे हाथ में अपनी जाति का चुनाव था. पर कोई तथाकथित निम्न जाति में जन्म लेने की वजह से तुच्छ हो जाए.ये ऐसी सामाजिक कुरीति है जिसको रोकने के लिए, आरक्षण, एससी एसटी एक्ट जैसे हथियार की जरूरत है. पर आरक्षण का फायदा निम्न से निम्न वर्ग तक पहूँचे इकके लिए सर्वजनिक फंड से चलने वाली समान स्कूली शिक्षा और स्वास्थ सेवाओं के पूर्ण सार्वजनिकीकरण की जरूरत है. ओबीसी आरक्षण मेरी समझ से बाहर है. उसके न तो पक्ष या विपक्ष में मैं कोई कॉमेंट कर रहा हूँ. क्योकि ओबीसी में बहुत सी ऐसी जातियाँ भी है जिसके बडी संख्या में लोग लोग आर्थिक समाजिक रूप से दंबंग है.