राजर्षि पुरुषोत्तम दास टण्डन जी स्वदेशी के रक्षक थे– प्रो० सुरभि स्वतन्त्र

'सर्जनपीठ', प्रयागराज की ओर से आन्तर्जालिक राष्ट्रीय बौद्धिक परिसंवाद का आयोजन

प्रयागराज की बौद्धिक, शैक्षिक, साहित्यिक और सांस्कृतिक संस्था ‘सर्जनपीठ’ की ओर से कुशल वक्ता, सन्त राजनेता तथा विदेह-जैसे वीतरागी महामानव राजर्षि पुरुषोत्तम दास टण्डन की जयन्ती का आयोजन किया गया।

इस अवसर पर ‘राजर्षि टण्डन की सत्ता और महत्ता’ विषयक बौद्धिक परिसंवाद की अध्यक्षता करते हुए, इन्दौर से साहित्यकार प्रो० सुरभि स्वतन्त्र ने कहा, “राजर्षि टण्डन जी स्वदेशी के रक्षक थे। स्वदेशी के प्रचारक ने अपने शरीर को अँगरेज़ी-दवाओँ से उसी प्रकार दूर रखा, जिस प्रकार से उन्होँने विदेशी वस्त्रोँ से स्वयं को दूर कर भारत-भारती के प्रति अटूट आस्था रखी थी। उनकी राष्ट्रवादिता प्रखर और मुखर थी। यही कारण है कि देश की आज़ादी के लिए उन्होँने प्राणपण से योगदान किया था।”

पटना से डॉ० कौशल किशोर ने बताया, “वे स्वतन्त्रतासेनानी तो थे ही, उन्होँने सामाजिक जीवन मे राष्ट्रीय चेतना जाग्रत् करने का भी काम किया था। उन्होँने यथासम्भव जन-जन को हिन्दीभाषा से जोड़ने का काम किया था। वे हिन्दी को स्वत्व और स्वाभिमान की भाषा मानते थे। यही कारण था कि वे हिन्दी को राजकाज की भाषा बनाना चाहते थे।”

आयोजक, भाषाविज्ञानी आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय ने कहा, “टण्डन जी चार विषयोँ पर अति मुखर थे :– पहला, वे भारत-विभाजन के विरुद्ध थे; दूसरा, वे संविधान से उन सारे प्रविधानो के विरुद्ध थे, जिन्हेँ अंगरेज़ोँ ने बनाये थे; तीसरा, वे हिन्दी को सम्पर्क-भाषा बनवाना चाहते थे। आगे चलकर, उन्होँने हिन्दी को सम्पर्क, राज और राष्ट्रभाषा बनवाने के लिए भी प्रयास किये थे। चौथा, वे ‘जनगणमन’ के स्थान पर ‘वन्दे मातरम्’ को राष्ट्रगान के रूप देखना चाहते थे; परन्तु संविधानसभा मे बहुमत के अभाव मे वे विफल रहे, फिर भी उनकी दृढ़ता मे कोई शिथिलता नहीँ आयी।”

नोएडा से डॉ० सरोज विश्वकर्मा का मत था, ” राजर्षि की पवित्र आत्मा हिन्दी के उन्नयन के लिए किसी रूप मे अवतरित होकर भारतभूमि में आयेगी तब कहीँ हिन्दी की समृद्धि होगी; क्योँकि वे आजीवन हिन्दीभाषा के उन्नयन-हेतु लगे रहे।”

सोलन से डॉ० राकेश वर्मा ने कहा, ”टण्डन जी की यह बात कि किसानो की सहायता के लिए काँग्रेस को लड़ने के लिए तैयार होना पड़ेगा, अब प्रासंगिक जान पड़ती है।”

डॉ० सुरेश निगम ने कहा, “भूमि-व्यवस्था और समाज-विकास पर टण्डन जी के विचार क्रान्तिकारी थे।”

इस अवसर पर डॉ० मुरली यादव, सरिता सिनहा, अपूर्व इत्यादिक ने भी विचार व्यक्त किये।