हे राम! देखिए कहाँ… माँ ने जीवित नवजात को फेंका

क्रिया की ‘प्रतिक्रिया’

आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय


★’हिन्दी साहित्य सम्मेलन’, प्रयागराज के सहायक मन्त्री श्यामकृष्ण पाण्डेय जी के नाम आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय का मुक्त पत्र

सम्मान्य सहायक मन्त्री श्यामकृष्ण पाण्डेय जी!
सादर अभिवादन।

सस्ती लोकप्रियता बटोरने के उद्देश्य से अधम मनोवृत्ति का पोषक, रविनन्दन सिंह की मेरे प्रति की गयी अप्रत्याशित टिप्पणी को आपने जिस तरह से ‘हवा’ देते हुए, मुझे ‘लाइलाज कैंसर’ कहा है; आपने मेरे प्रति जिस शब्दावली का प्रयोग किया है, उससे मैं इतना आहत हूँ कि आज (२० अक्तूबर) सार्वजनिक रूप से घोषित कर रहा हूँ– आदरणीय श्यामकृष्ण पाण्डेय मेरे लिए मर चुके हैं और मैं उनके लिए मर चुका हूँ।

श्यामकृष्ण पाण्डेय जी! आपमें यदि एक प्रतिशत भी ‘हृदयजीविता’ बची हो तो अनुभव कीजिए, मुझे आपने अनावश्यक और अप्रत्याशित रूप से अविस्मरणीय आहत किया है।

श्यामकृष्ण पाण्डेय जी! आपने कभी अपने भीतर झाँकने की कोशिश की है– आप भीतर से क्या हैं और बाहर से क्या हैं? अब सुनिए और समस्त देशवासी सुनें। ये वही श्यामकृष्ण पाण्डेय हैं, जिनकी ‘छात्र-आन्दोलन का इतिहास’-विषयक एक बृहद् पुस्तक आयी थी तो उन्होंने मुझे हिन्दी साहित्य सम्मेलन के अपने कक्ष में बुलाया था। मैं वहाँ गया था, तब उन्होंने इतिहास-विषयक अपनी एक पुस्तक दिखायी और उसका कैसे प्रचार-प्रसार हो, इस पर मुझसे मन्त्रणा की थी। मतलब साफ़ था, इसलिए चाय भी पिलवायी थी। एक बात और बता दूँ, श्यामकृष्ण पाण्डेय इससे पूर्व तक मुझे फूटी आँखों से भी देखना पसन्द नहीं करते थे। बहरहाल, मेरे भावुक हृदय के स्पन्दन ने कहा– अतीत को भूल जाओ और श्यामकृष्ण पाण्डेय के लिए कुछ करो। मैंने इलाहाबाद दूरदर्शन में समीक्षा और भेंटवार्त्ता के लिए व्यवस्था करा ली थी। उससे पूर्व श्यामकृष्ण पाण्डेय ने मेरे मना करने पर भी अपने निवास पर बुलाया। वहाँ मेरे लिए पहले से ही भोजन करने की व्यवस्था करा ली गयी थी। अनेकश: मना करने के बाद भी मैं श्यामकृष्ण पाण्डेय के आग्रह के सम्मुख नतमस्तक हो गया। भावपूर्ण भोजन करने के पश्चात् मूल विषय पर वार्त्ता आरम्भ हो चुकी थी। श्यामकृष्ण पाण्डेय और उस पुस्तक की सह-लेखिका उनकी पुत्री को मैंने बताया कि भेंटवार्त्ता में कौन-कौन-से प्रश्न किये जायेंगे; मैंने लिखवा भी दिये थे; क्योंकि भेंटवार्त्ताकार मैं ही था। दूरदर्शन में नियत समय पर भेंटवार्त्ता हो चुकी थी। इलाहाबाद-दिल्ली- लखनऊ-भोपाल-पटना की पत्र- पत्रिकाओं में श्यामकृष्ण पाण्डेय की उक्त पुस्तक की मैंने समीक्षाएँ भी प्रकाशित करायी थीं। पिता-पुत्री का गौरवान्वित होना स्वाभाविक था और सुखद भी। उसके कुछ दिनों बाद श्यामकृष्ण पाण्डेय ने मुझे सम्मेलन बुलाया और इस आशय की बात कही– ज़रा इस पुस्तक को देख लीजिए, इसमें और क्या-क्या जोड़ा जा सकता है। आपको इसमें स्वतन्त्रता है। इसे अपने साथ ले जाइए। श्यामकृष्ण पाण्डेय का इसके पीछे मन्तव्य यह था कि पृथ्वीनाथ पाण्डेय उसमें भाषिक और ताथ्यिक संशोधन करें और परिवर्त्तन और परिवर्द्धन भी। मैंने प्रकारान्तर से मना कर दिया था। उसके दो कारण थे :– पहला, मुझे अपना मूल कर्म छोड़कर श्यामकृष्ण पाण्डेय की ‘चाकरी’ करनी पड़ती और दूसरा, मैं जब पढ़ता तब उनकी पुस्तक ‘अशुद्धियों’ से रँग जाती और जो भी क्षुद्र स्वार्थ से युक्त सम्बन्ध था, उसमें दरार आ जाती।

राजनीति में पूरी तरह से असफल रहे व्यक्ति श्यामकृष्ण पाण्डेय की विशेषता रही है– अवसर सिद्ध करने के लिए ‘गदहे’ को भी ‘बाप’ बना लो। यह व्यक्ति कई वर्षों से उसके ‘फेसबुक’ से जुड़े अन्य राज्यों के मेरे विद्यार्थियों से इस आशय की बात कहता रहा है :– पृथ्वीनाथ पाण्डेय को इलाहाबाद में कोई नहीं जानता। वह हमारे पास आता है तो उसे हफ़्ते-दो हफ़्ते में हम लोग अनुवाद या फिर कोई छोटा-मोटा काम देकर भगा देते हैं।

श्यामकृष्ण पाण्डेय! मैंने आपसे कब और कौन-सा काम माँगा है? फिर आपका साहित्यिक स्तर है ही क्या, जो मैं आपके पास पहुँचूँ? साहस हो तो उत्तर दीजिए। जो व्यक्ति ख़ुद भूखा है, वह दूसरों को क्या देगा।

याद कीजिए, श्यामकृष्ण पाण्डेय! हिन्दी साहित्य सम्मेलन के पाक्षिक पत्र ‘राष्ट्रभाषा सन्देश’ का, भोपाल में आयोजित ‘विश्व हिन्दी सम्मेलन’ के अवसर पर ऐतिहासिक ‘हिन्दीदिवस- विशेषांक’ प्रकाशन की योजना बनी थी, जिसे मैंने सम्मेलन के प्रधानमन्त्री, श्रद्धेय भ्राताश्री विभूति मिश्र जी के सान्निध्य में बनायी थी। मैंने अपने सहृदय लेखक-लेखिकावृन्द से भाषाविषयक विविध लेख मँगाये थे। वह योजना हिन्दी साहित्य सम्मेलन के इतिहास में मेरे सम्पादन में पहली बार बहुवर्णीय विशेषांक की थी। समाचारपत्र की प्रकाशन-प्रक्रिया अन्तिम चरण में थी। इसमें मेरी भूल थी कि उसमें प्रकाशित होने के लिए मैंने आपसे लेख माँग लिया था। आपके प्रति मेरी यह सदाशयता मुझ पर इतनी भारी पड़ी थी कि आपने मेरे अधिकारक्षेत्र में बलप्रयोग करते हुए, अनधिकार हस्तक्षेप करते हुए, सम्मेलन की अक्षरसंयोजन -इकाई से लेकर मुद्रण-प्रकोष्ठ पर अपना वर्चस्व स्थापित करते हुए, मुझे एक किनारे करा दिया था। आपने मेरे अनेक लेखकवृन्द के लेख रोककर अपना, अपनी पुत्री के विस्तृत लेख छपवाये। इतना ही नहीं, मुझे अपना अधिनायकत्व (तानाशाही) का अनुभव कराने के लिए आपने अवांछित सामग्री भी छपवायी थी। आदरणीय प्रधानमन्त्री जी के जिस ‘सन्देश’ को उनसे आग्रह करके उनके अस्वस्थ रहते हुए भी बोलवाकर मैंने लिखा था, आपने उसे हटाकर अपनी ओर से सन्देश लगा दिया था? मेरा सम्पादकीय मुखपृष्ठ पर छप रहा था, उसे हटवाकर आपने सबसे अन्तिम पृष्ठ पर मुद्रण कराया था। सारे प्रमाण मेरे पास हैं। बहरहाल, मैंने भी अपना प्रभाव दिखाते हुए, उसी क्रम में दो और विशेषांक निकलवाकर अपने लेखिका-लेखकों के लेख छपवाये भी थे।

मैं सम्मेलन के अधिवेशन में आपके मेरे प्रति अशोभनीय दृष्टिबोध के कारण ही नहीं जाता था; परन्तु समादरणीय प्रधानमन्त्री जी के अनेकश: आदेश को मैं टाल नहीं सकता था; क्योंकि प्रधानमन्त्री से पहले वे मेरे ‘श्रद्धेय भ्राताश्री’ हैं।

मैं जबसे सम्मेलन के अधिवेशन में जा रहा हूँ तब से आपको तीनों दिनों प्रत्येक सत्र में माइक्रोफ़ोन पकड़कर आत्मप्रदर्शन करते हुए देखता आ रहा हूँ। तीनों दिनों के प्रत्येक सत्र में आप दोनों हाथों से कुर्सी पकड़ तना हुआ बैठे रहते हैं। फ़ोटो खिंचवाने के लिए आपकी एकांगी भूख सार्वत्रिक हो चुकी है। क्या हिन्दी साहित्य सम्मेलन व्यक्ति-विशेष (श्यामकृष्ण पाण्डेय) का है? ऐसा भूखा व्यक्ति मुझे अथवा किसी को भी क्या दे सकता है? आपने तो इलाहाबाद-प्रयागराज और देश के अन्य भागों की युवाप्रतिभाओं को कभी महत्त्व नहीं दिया है। मैं जिस वर्ष से सम्मेलन के अधिवेशन में जाने लगा हूँ तब से देशवर्ष में सगर्व सक्रिय मेरे शिष्या-शिष्यवृन्द अधिवेशन के प्रचार-प्रसार में खुलकर योगदान करते आ रहे हैं। आपने देखा होगा। उत्तर दीजिए।

फ़िलहाल इतना ही।

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