कोथावाँ प्रा०वि० का हाल, बच्चों को दूध और फल नहीं दे रहे जिम्मेदार

कविता : प्रेम की अनुभूति

आकांक्षा मिश्रा, बस्ती-


प्रेम की बारिश में
ख्वाहिशों का समन्दर
शब्दों के बन्धनों में बंधे हुए अब
यही प्रेम मेरा
समीकरण है
जहां मेरा प्रेम ही मुझसे
लिखवाता हैं
तुम कहते हो कि प्रेम नहीं
अभी प्रेम की उपज नहीं
हृदय में
तुम्हारी ये बाते ही मुझे प्रेम के
रंगो में रंगती है ,
जहाँ मेरी धैर्य ही मेरी शक्ति बनकर
बार -बार मुझे हौसला
देती हैं
यही भाव यकीन में बदलकर मुझे
तुम्हारे समक्ष लाती है
जिसे तुमने यही नाम दिया
सब मोह के धागे है ,
जो तुम मुझसे जोड़ती हो
यकीनन मैं तुमसे
जोड़ती हूँ
प्रेम के सभी द्वार से गुजरती हुई
समेट लेना चाहती हूँ
प्रेम के तीन मार्ग स्वेच्छा के
द्वार पर पड़े मिलते हैं
जहाँ सिर्फ समर्पण के
प्रथम भाव ही प्रेम के तह में
जाकर त्याग भावना
से पूर्ण होकर पुनः उसी द्वार
पर सिमटकर मुक्ति के द्वार
तय करती हुई
जीवन के विभाजन में
समग्रता लिए हुए
पुनः सहज भावों को समेट
लेना प्रेम का पुलकित रूप रहा
जो कई बार संचेतना में सम्भावनाओं
के अभिराम में स्थिति होकर
प्रत्यक्ष रूप से सम्भाव्य का आना है
इसी सम्भाव्य में मूलतः
प्रेम के मधुर स्वर को उत्पन्न
करती हुई
समीपता प्रकट करती हैं
प्रेम की गति में सिर्फ प्रेम का
अनुसरण कर
दोनों ही समर्पण के भाव
में पराकाष्ठा के शेष में
जलती हुई हर सम्भव अंक में
क्षितिज के समक्ष सुर्ख लाल
रंग माथे पर बिखेरती हुई
प्रेम को प्रगाढ़ बनाने की चेष्ठा की
वही भाव प्रेम ,प्रेम का भाव सिर्फ
मन का विस्तारण करती रही
समग्रता के लिए स्पर्श
हृदय का करती और माथे पर
गोल लाल बिंदी शोभित
रूप को पाकर
मस्तक को गौरव प्रदान करती
यही प्रेम जब पहली पराकाष्ठा से
गुजरती हुई
जीवन की गति में सब कुछ
व्यवस्थिति करती हुई
लम्हा -लम्हा दिव्य रूप और
दिव्य- प्रेम की अलौकिक ज्योति
प्रकाशित होकर पुनः
आशा का संचार करती हैं ।