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विश्वास और अविश्वास के बीच की कड़ी है ‘धर्म’

धर्म तो विश्वास और अविश्वास के बीच की कड़ी है!
ये हमारे जीवन को कैसे प्रभावित करती है..?

धर्म किसी के विश्वास और अविश्वास का मोहताज नहीं होता।
बल्कि धर्म तो संसार की सबसे महत्त्वपूर्ण वस्तु है। धर्म के बिना संसार निराधार हो जाता है।
धर्म मानवता की नीवँ है।
धर्म मानवता का शुभारंभ है।
धर्म सद्गुण, समृद्धि, सुख और स्वास्थ्य का स्रोत है।
धर्म क्षीण होने से मानवता क्षीण होने लगती है।
धर्म की वृद्धि होने से मानवता का विकास होने लगता है।
जिसकी मानसिक क्षमता का उदय हो चुका वही मनुष्य है।

मन से ही सत्य का ज्ञान होता है।
सत्य के अनुकूल आचार-व्यवहार ही धर्म कहलाता है।
अतः धर्म सदैव केवल मनस्वी एवं प्रबुद्ध मनुष्यों के लिए ही प्रशस्त है मूर्खों और पशुओं के लिए नहीं।

मूर्ख या धूर्त मनुष्य ही धर्म को विश्वास और अविश्वास के बीच की कड़ी मानते है।
क्योंकि वे यथार्थतः धर्म को जानते ही नहीं।
और सत्यविहीन मिथ मॉन्यताओं को ही धर्म मानकर अन्धविश्वास के सहारे धार्मिक बने रहने का पाखंड मात्र करते हैं।

वास्तव में सत्य ही धारणीय होता है इसीलिए सत्य को ही धर्म कहा गया है।
सत्य के अतिरिक्त दूसरा कुछ भी धर्म नहीं होता।
सत्य ही परस्पर प्रेम, न्याय, पुण्य के व्यवहार का आदेश करता है।
बस इतना ही चार आयामी सतधर्म है।
जिसे सनातन धर्म कहते है।

अन्य किसी धर्म का इस संसार में न कोई औचित्य है न कोई जरुरत…!
जिस पर किसी मनुष्य को विश्वास और अविश्वास के झूले में जीवन भर झूलना पड़े।

✍️🇮🇳 (राम गुप्ता, स्वतन्त्र पत्रकार, नोएडा)