सूर्योपासना के महापर्व छठ पर मंगल कामनाएँ

महेन्द्र महर्षि (से. नि. प्रसारण अधिकारी)


   प्राय: यह माना जाता था कि छठ बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश का स्थानीय पर्व होता है। मगर ख़ुशी हो रही है कि अब इस पर्व का लगभग राष्ट्रीय स्वरूप उभर आया है। 
जाति-प्रान्त के बन्धनों को लांघ कर छठ की लोकप्रियता पूर्वांचल से बाहर निकल , उन सभी समुदायों में मान्य हो चली है जो प्रकृति के महत्व को समझने लगे हैं। आदित्य देवता सूर्य की उपासना का यह पर्व मौसमी उत्पादनों की उन्हें भेंट का ऐसा सामाजिक अनुष्ठान है जिनकी जन स्वास्थ्य में महती भूमिका है। कच्ची हल्दी,अदरक, हरे पत्ते की मूली, कोहडा, अमरख, कमरख, शरीफा, गल-गल नींबू , शकरकंदी,आँवला, गन्ना, साठी का चावल आदि इस मौसम के कृषि उत्पाद हैं , जिन्हें जन जन तक वितरण का छठ महत्वपूर्ण अनुष्ठान है। 

इनका भोग सूर्य को अर्पित करने की परंपरा , मात्र धार्मिक नहीं अपितु इसके साथ जुड़ी सामूहिक चेतना और सौहार्द भाव है।जब देश में तालाब और जोहड़ लुप्त प्रायः हो रहे हैं तब त्योहार के लिए इनका निर्माण किया जाना , जल संरक्षण की वैज्ञानिक जागरूकता का द्योतक है। 

पर्व ख़ुशी का सामूहिक मौक़ा होता है , ऐसे में सूर्य का धुएं की चादर के पीछे से मद्धम दर्शन कहीं कचोटता भी है। सूर्य भगवान तो जागृत हैं, हमें उनके सम्मान में धुन्ध को उठाने की जुगत करनी है। 

पर्व पर सभी को बधाई !
१.११.२०१९

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