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सीडीसी की रिपोर्ट और कोरोना वैक्सीन का सच

सन्त समीर (वरिष्ठ पत्रकार व प्राकृतिक चिकित्सा पद्धति के जानकार, दिल्ली)

आख़िरकार टीके के पक्ष में किए जाने वाले सबसे बड़े दावे का भी दम निकल गया। दम भी उसी ने निकाला, जो टीके का सबसे बड़ा समर्थक है। विदेशी अख़बारों ने तो ख़ैर पूरी ख़बर दी है, पर लगता है हमारे देश के ज़्यादातर अख़बारों ने टीकाकरण अभियान की नाक बचाने के लिए आधी-अधूरी ख़बर दी है और असली बात छिपाने की कोशिश की है।

बात मैं अमेरिका के सेण्टर फॉर डिजीज़ कण्ट्रोल एण्ड प्रिवेंशन (सीडीसी) की बीते शुक्रवार को जारी की गई रिपोर्ट की कर रहा हूँ। सीडीसी ने कोरोना से सङ्क्रमित हुए 469 लोगों का अध्ययन किया। पता चला कि इनमें से 74 प्रतिशत लोगों ने टीके की दोनों डोज़ ली थी। कई लोगों को टीका लगवाए दो महीने से अधिक हो चुके थे, यानी इम्युनिटी हर हाल में विकसित हो जानी चाहिए थी। बावजूद इसके इनमें से हर पाँच में से चार यानी 80 प्रतिशत लोग सिर्फ़ सङ्क्रमित ही नहीं हुए, बल्कि अस्पताल में भी कइयों को भर्ती कराना पड़ा। मतलब यह कि टीके के पक्ष में जो सबसे बड़ा दावा था कि टीका लगने के बाद सङ्क्रमण होगा भी तो बहुत हल्का होगा और एक भी मरीज़ को अस्पताल में भर्ती होने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी, वह महज़ छलावा साबित हुआ है। ‘विज्ञान के अन्धे बुद्धि के पूरे’ हमारे महाविद्वान् विशेषज्ञ यह भी दावा कर रहे थे कि टीका कोरोना के हर वैरियण्ट से बचाएगा और सङ्क्रमण हुआ भी तो वायरस लोड ज़्यादा नहीं होने देगा, पर दावे के इस मज़बूत महल को भी इस शोध ने धराशायी कर दिया है। मालूम नहीं ‘लल्लनटाप’ के तथाकथित वैज्ञानिक बन्धुओं की ढिठाई अभी वैसी ही रहेगी या अब उन्हें भी थोड़ी-बहुत शर्म आएगी?

शोध का निष्कर्ष है कि जिन्होंने टीका लगवाया था और जिन्होंने नहीं लगवाया था, दोनों ही तरह के लोगों में वायरस लोड एक जैसा पाया गया है। इसका अर्थ यह है कि टीका लगवा चुके लोग भी उतनी ही तेज़ी से सङ्क्रमण फैलाएँगे, जितनी तेज़ी से बिना टीका लगे लोग। यहाँ मेरा अन्दाज़ा इससे कुछ और अलग है। मेरा मानना है कि बिना टीका लगवाए हुए सिर्फ़ वे ही लोग सङ्क्रमण फैलाने का काम कर सकते हैं, जो सेहत के लिए एलोपैथी तौर-तरीक़ों के भरोसे ज़्यादा रहते हैं और अपनी इम्युनिटी काफ़ी कमज़ोर कर चुके हैं। जो लोग एक बार सङ्क्रमित हो चुके हैं और ढेर सारी एलोपैथी दवाएँ खाने के बाद जैसे-तैसे अस्पताल से बाहर आए हैं, वे भी अगर दुबारा सङ्क्रमित हुए तो तेज़ सङ्क्रमण फैला सकते हैं। याद रखने की बात है कि कोरोना को ख़तरनाक बनने का बेहतर माहौल ऐसे ही लोगों के शरीर में ज़्यादा मिलता है। वायरस के डेल्टा जैसे वैरियण्ट ऐसे ही शरीरों में विकसित होते हैं। जिनके आहार-विहार में कृत्रिमता कम है या जो प्रकृति के आसपास की जीवनशैली जीते हैं, उनके शरीर में कोई भी वायरस ज़्यादा ख़तरनाक म्यूटेशन नहीं कर सकता। यहाँ यह भी ध्यान रखना चाहिए कि वैरियण्ट के नाम पर हमारे चिकित्सा विज्ञानी अक्सर बचने की पतली गली ढूँढ़ते हैं। पहले से स्पष्ट है कि आरएनए वायरस है, आप ग़लत ढङ्ग से जितना उसको छेड़ेंगे, उतनी आसानी से वह अपना अस्तित्व बचाने के लिए ख़ुद को तैयार कर सकता है या कहें म्यूटेट कर सकता है। आप अल्फा, बीटा, गामा, डेल्टा नाम देते रहिए। बात यह कि वायरस के आगे टीका बेदम साबित हो रहा है।

सीडीसी की निदेशक रोसेल वालेंस्की ने हिदायत दी है कि टीका लगवाए हुए लोग भी कहीं जाएँ तो मास्क ज़रूर लगाएँ, वरना ख़तरे में रहेंगे। यह बात अलग है कि आधुनिक चिकित्सा विज्ञान की मुसीबत यह है कि वह आधे शोध पर अक्सर पूरे नियम बनाने की कोशिश करता है। इन चिकित्सा विज्ञानियों को कई साल बाद समझ में आएगा कि उन्होंने जिस मास्क को वायरस से बचने का रामबाण नुस्ख़ा समझा, उसने वास्तव में सङ्क्रमण को कुछ और ख़तरनाक बनाया। चार-छह दिन अगर मास्क लगाकर किसी वायरस से कुछ हद तक बचने की बात हो, तो इसकी वकालत की जा सकती है, पर साल-दो साल लगातार मास्क लगाना ‘आ बैल मुझे मार’ वाली कहावत को चरितार्थ करना है। कारण साफ़ है। प्रकृति की ओर से किसी भी जीव-जन्तु की नाक मास्क लगाए रखने के हिसाब से डिज़ायन नहीं की गई है, बल्कि इसके ज़रिये फेफड़ों तक साफ़-सुथरी खुली हवा जानी चाहिए। लम्बे समय तक मास्क लगाने का मतलब है कि फेफड़ों तक पर्याप्त ऑक्सीजन को जाने देने से रोकना, बल्कि अपने ही छोड़े कार्बन डाई ऑक्साइड के मास्क में घुमड़ रहे कुछ हिस्से को बार-बार अन्दर खींचना। ज़्यादा मास्क लगाना फेफड़ों की क्षमता को कमज़ोर करना है। मतलब स्पष्ट है कि लम्बे समय तक मास्क लगाकर हम ऑक्सीजन की कमी से होने वाली बीमारी हाइपोक्सिया को आमन्त्रित करते हैं और अपने फेफड़ों के भीतर ऐसा माहौल बनाते हैं कि किसी भी नुक़सानदेह वायरस को वह अपनी बस्ती बसाने लायक़ लगने लगे। अच्छा तरीक़ा यह है कि सिर्फ़ वहाँ हल्के मास्क का प्रयोग किया जाए, जहाँ प्रदूषण से बचना ज़रूरी लगे। अन्य जगहों पर मास्क उतारकर लम्बी-गहरी साँस लेने का अभ्यास करने में समझदारी है।

कुल निष्कर्ष यह है कि अगर आपने टीका लगवाया है तो इस मुग़ालते में बिलकुल न रहें कि आप सुरक्षित हैं या अपने पड़ोसी को अब आप सङ्क्रमित नहीं करेंगे। अजब विडम्बना है कि प्रयोगशालाओं में बैठे लोग वे बातें अब कह रहे हैं, जो हमारे जैसे सड़क पर खड़े लोग शुरू से लगातार कहते आ रहे हैं। यह भी कम बड़ा विरोधाभास नहीं है कि जहाँ इसे बड़ी बीमारी मानकर बड़ा इलाज किया गया, वहाँ लोग मरते रहे, पर जहाँ इसे आसान बीमारी मानकर आसान इलाज किया गया, वहाँ मरीज़ों को आसानी से बचा लिया गया। मेरे जैसे होम्योपैथी और नेचुरोपैथी से इलाज का काम कर रहे लोगों ने मास्क, हैण्ड सेनेटाइजर और सोशल डिस्टेंसिङ्ग, तीनों का पालन करना ग़ैरज़रूरी महसूस किया। बिस्वरूप राय चौधरी ने देश के अलग-अलग हिस्सों में क़रीब आधा दर्जन कोविड अस्पताल बनाए और उनके पाँच सौ से ज़्यादा चिकित्सकों ने बग़ैर मास्क के साठ हज़ार से ज़्यादा मरीज़ों का इलाज किया। असली ब्रेकिङ्ग न्यूज़ वहाँ थी, पर मुख्यधारा के मीडिया ने यह सब दिखाने से परहेज़ किया, क्योंकि जनता को डराए रखना शायद ज़रूरी है। मीडिया का मौजूदा चरित्र यह है कि जनहित का ध्यान वहाँ तक रखा जाना चाहिए, जहाँ तक कि विज्ञापनदाता का हित प्रभावित न होता हो। इसका मतलब यह भी नहीं है कि पत्रकारों ने ऐसी ख़बरों को नहीं दिखाना चाहा, वास्तव में तमाम पत्रकारों ने दिखाना तो चाहा, पर वे चाहकर भी नहीं दिखा सके, क्योंकि उनकी स्थिति आज की तारीख़ में अपने संस्थान में बँधुआ की न सही, पर एक साधारण मजदूर से अच्छी भी नहीं है। अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता पर रोक सरकारें कम, मीडिया संस्थान अपने कर्मचारियों पर ज़्यादा लगाते हैं। जिन्हें ख़ुशफ़हमी हो, वे मजीठिया वेतनमान मामले को याद कर सकते हैं।

एक आख़िरी बात याद आ रही है। जो लोग मेरी पोस्टें लगातार पढ़ते रहे हैं, उन्हें याद होगा कि यह तथाकथित महामारी जब फैलनी शुरू हुई थी और कहा जा रहा था कि सारे संसार में तबाही मच जाएगी और दो से पाँच करोड़ लोग मौत के शिकार होंगे, तो मैंने कुछ आँकड़ों के आधार पर अनुमान लगाया था कि इसमें मृत्युदर .01 प्रतिशत के आसपास रहेगी। मैं अकेला नहीं था, बीतते समय के साथ दुनिया के तमाम लोगों ने इसके आसपास के ही आकलन किए थे। यह आकलन धीरे-धीरे सही होने की तरफ़ जा रहा है। इसे कुछ इस तरह समझा जा सकता है। आज 2 अगस्त, 2021 को सवेरे जब यह पोस्ट लिख रहा हूँ तो दुनिया भर में कोरोना सङ्क्रमितों की सङ्ख्या दर्ज हुई है, उन्नीस करोड़ नब्बे लाख सात हज़ार छह सौ इक्कीस। मरने वाले हैं, बयालीस लाख चालीस हज़ार तीन सौ बारह। मृत्यदर हुई 2.10 प्रतिशत। आपको लगेगा कि यह तो बहुत ज़्यादा है, पर बात आगे और साफ़ होगी। भारत का सन्दर्भ लें तो यहाँ सङ्क्रमित दर्ज किए गए हैं, तीन करोड़ सोलह लाख पञ्चानवे हज़ार तीन सौ अड़सठ। मरने वालों की सङ्ख्या है, चार लाख चौबीस हज़ार आठ सौ आठ। इस हिसाब से भारत में मृत्युदर हुई 1.34 प्रतिशत। याद रखने वाली बात है कि यह मृत्युदर उन सङ्क्रमितों के हिसाब से है, जो दर्ज किए गए हैं या कहें जिनकी मशीनी जाँच की जा सकी है। सीरो सर्वे रिपोर्टों को देखें तो भारत की सत्तर प्रतिशत आबादी सङ्क्रमित हो चुकी है। सही मृत्युदर इसी हिसाब से निकलेगी, क्योंकि मशीनी जाँच करने में वर्षों लग जाएँगे, जबकि वायरस अभी ही अपना काम कर गुज़रा है। सीरो सर्वे देखें तो भारत में मृत्युदर बनती है 0.04 प्रतिशत। जिस दिन इस बात पर शोध होगा कि डरावना माहौल बनाने के नाते और जिस बीमारी की कोई दवा नहीं थी, उसके लिए अनाप-शनाप प्रयोगात्मक दवाएँ देने के नाते कितने लोगों की मौत हुई, तो मृत्युदर और कम हो जाएगी। इसके अलावा कई दूसरी बीमारियों में इस बार कम मौतें दर्ज हुई हैं, जो स्पष्ट सङ्केत दे रहा है कि कोरोना की मौतों में साधारण निमोनिया और हृदय रोग वग़ैरह की भी तमाम मौतें जुड़ी हुई हैं। ज़ाहिर-सी बात है कि सही हिसाब-किताब के बाद इस बीमारी में मृत्यदर 0.01 प्रतिशत से ज़्यादा नहीं होगी और अगर प्रचार करके फ़िज़ूल में डरावना माहौल न बनाया जाय तो इतनी नौटङ्की के बाद भी यह महामारी साबित नहीं हो सकती।