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किसान-क्रान्ति ‘ऐतिहासिक’ मोड़ पर

आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

‘मुक्त मीडिया’ का ‘आज’ का सम्पादकीय


★ आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

आज यदि किसान-आन्दोलन-वार्त्ता का पाँचवाँ दौर परिणामरहित रहा। ऐसे में, सरकार को चाहिए कि वह किसानों के लिए बनाये गये अधिनियम को निरस्त कर, उन प्रतिनिधियों के साथ बैठकर पुन: किसानहित में प्रारूप तैयार कराकर और सर्वदलीय बैठक आयोजित कर उस पर परामर्श करने और उनकी सहमति के बाद ही पुन: सदन में विधेयक लाये। यह विधेयक सर्वसम्मति से-ध्वनि मत से सदन में पारित हो तो शुभकारी होगा, अन्यथा किसान तो आन्दोलन-मार्ग पर बढ़ ही चुके हैं। आबाल वृद्ध नर-नारी ‘दिल्ली और हरियाणा’ की सीमा पर ‘काले कनुन’ (काले क़ानून) को वापस लेने की माँग पर अड़े हुए हैं। किसानों की एक बड़ी संख्या ऐसी है, जो ट्रैक्टर में सोते हैं और उसके नीचे भी। वे ट्रैक्टर से अपने मोबाइल को चार्ज भी कर लेते हैं। इस तरह से लगभग ६ से १० डिग्री तापमान पर किसान अपने क्रान्तिरथ पर डँटे हुए हैं, जो कि पूर्णत: शान्तिपूर्ण है।

किसानों और उनके प्रतिनिधियों को यह ध्यान करना होगा कि उनका आन्दोलन देशहित में है, न कि देशविरोध में, इसलिए सभी कृषक ”भारत माता की जय”, “जय जवान-जय किसान”, “किसान-आन्दोलन ज़िन्दाबाद” का ही उद्घोष करें। वे यदि ”ख़ालिस्तान ज़िन्दाबाद” अथवा इसी तरह के देशविरोधी नारे लगाते हैं तो देश का जनसामान्य उनके आन्दोलन से अपने को अलग कर लेगा। किसानों को नहीं भूलना चाहिए कि उनका स्थान देश में ‘शीर्ष’ स्थान पर है; क्योंकि वे देश के ‘अन्नदाता’ हैं।

संघ का अर्थ होता है, ‘मुट्ठीबन्द’। मुट्ठी तभी बन्द होती है जब सभी अँगुलियाँ साथ दें। वह मुट्ठी ‘शक्ति’, ‘एकता’, ‘अखण्डता’ तथा ‘अक्षुण्णता’ की परिचायिका होती है। किसानों के लिए जितने भी प्रकार के संघ गठित किये गये हैं, उनमें पारस्परिक सैद्धान्तिक और व्यावहारिक मत-मनभेद नहीं होना चाहिए। ऐसा इसलिए कि संघ/संघटन की एक आवाज़ पर सभी ओर से एक साथ हाथ उठ खड़े हों। इसे ही कहते हैं :– संघटन में शक्ति है। ऐसा न होने पर किसान-आन्दोलन में बिखराव आ सकता है।

सरकार तो चाह ही रही है कि किसानों के संघटनों में आपसी वैमनस्य के आधार पर बिखराव और दरार पैदा हो जाये; क्योंकि यह सरकार अपने गठन के आरम्भ से ही मनमानी करती आ रही है। ब्रिटिश सरकार के नीति-मार्ग :– “फूट डालो और राज करो” पर यह सरकार चली आ रही है, जो कि राष्ट्रघाती है।

कृषक-क्रान्ति को समाप्त कराने के लिए आज (५ दिसम्बर) ‘विज्ञानभवन’, दिल्ली में कृषक-नेता और सरकार के प्रतिनिधिमण्डल के मध्य पाँचवें दौर की वार्त्ता सफल सिद्ध नहीं हुई है। इसका मुख्य कारण यह है कि कृषक-नेता किसानों से सम्बन्धित अधिनियम को वापस कर, नये सिरे से क़ानून बनाने की बात कर रहे हैं और सरकारी प्रतिनिधिमण्डल बनाये गये क़ानून में संशोधन करने की बात पर अड़ा हुआ है और ‘कालू क़नुन’ को वापस लेने के ‘मूल’ विषय पर मौन है। इससे ज़ाहिर होता है कि सरकार की मंशा किसान-विरोधी दिख रही है और कॉरपोरेट-तन्त्र को लाभ दिलाने की। अब कृषक-प्रतिनिधि-मण्डल ने दो टूक कह दिया है :— सरकार अपना निर्णय ‘हाँ’ अथवा ‘न’ में सुनाये। सरकारी प्रतिनिधि-मण्डल ने न तो ‘हाँ’ में निर्णय किया और न ही ‘न’ में। सरकार की ओर से ‘टालने’ की प्रवृत्ति सामने आ चुकी है। अब सरकार की ओर से अगली वार्त्ता बुद्धवार (९ दिसम्बर) को करने के लिए प्रस्ताव किया गया है। प्रश्न है, कृषक-प्रतिनिधिमण्डल ने जब सुस्पष्ट कर दिया है कि किसानों को ‘काले क़ानून’ को वापस लेने के अलावा कुछ मंज़ूर नहीं है और सरकारी प्रतिनिधिमण्डल ने कहा है कि क़ानून तो वापस नहीं होगा, संशोधन करा दिया जायेगा। ऐसे में, अगली वार्त्ता का औचित्य क्या है? दूसरी बात, यदि सरकार समस्या का निराकरण करना ही चाहती है तो अगली वार्त्ता की तारीख़ तीन दिनों बाद निर्धारित क्यों की है? कल भी तो वार्त्ता की जा सकती है। सरकार की यह नीति एक प्रकार से किसान-आन्दोलन को ‘उग्र’ करने की दिशा में बढ़ चुकी है। सरकार को मालूम नहीं, किसान आबाल वृद्ध नर-नारी के साथ ठण्ढ में खुले आसमाँ के नीचे जी रहे हैं? मुख्य बात यह है कि सरकार ने अब जिस वार्त्ताक्रम को तीन दिनों बाद करने का प्रस्ताव किया है, उसके पीछे कृषक-आन्दोलन को मौसम के प्रभाव के कारण कमज़ोर बनाने का है। ऐसे में, कृषक-प्रतिनिधियों को ९ दिसम्बर की सरकारी पेशकश को इन्कार कर देना चाहिए।

(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; ५ दिसम्बर, २०२० ईसवी।)

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