सई नदी की करुण कथा : पौराणिक और ऐतिहासिक नदी मर रही है

शब्दों और अंकों का शुद्ध उच्चारण और लेखन करना सीखें

आचार्य पण्डित पृथ्वीनाथ पाण्डेय की पाठशाला

♀ प्रथम― प्रत्युत्पन्नमति
♀ द्वितीय― शुश्रूषा
♀ तृतीय― ५९
♀ चतुर्थ― पोषकतत्त्व
♀ पंचम― ९५ 
♀ षष्ठ― वीणापाणि

प्रत्युत्पन्नमति :― प्रथम शब्द है― प्रत्युत्पन्नमति।
प्रति+उत्पन्न+मति― इसका शाब्दिक अर्थ है, ‘मस्तिष्क मे तत्काल उत्पन्न हुआ’। इसकी परिभाषा है― जो शीघ्र बात अथवा युक्ति मस्तिष्क मे उत्पन्न हो जाये, वह ‘प्रत्युत्पन्नमति’ है। आप इसे अँगरेज़ी मे ‘प्रेज़न्स ऑव़ माइण्ड’ कहेंगे; ‘ऑफ़’ के स्थान पर ‘ऑव़’ का उच्चारण करेंगे। इसमे प्रयुक्त ‘प्रत्युत्पन्न’ विशेषण का शब्द है, जो संज्ञा-शब्द ‘मति’ की विशेषता का बोध कराता है। संधि-विचार करें तो ‘प्रत्युत्पन्न’ ‘यण्’ संधि है। आप ‘यण्’ का उच्चारण करेंगे; क्योंकि यण् के ‘ण’ मे हल् चिह्न लगा होता है। आपने जैसे ही ‘यड़’ अथवा ‘यड़्’ का उच्चारण किया वैसे ही आपका उच्चारण अशुद्ध हो जायेगा। आपको ‘ण’ कहना होगा। आपका ‘ण्’ अनुस्वारयुक्त है, इसलिए ‘नासिका’ के द्वारा शुद्ध उच्चारण करना होगा। आप ‘हल्’ का उच्चारण करेंगे; क्योंकि हल के ‘ल’ मे ‘हल् चिह्न’ (यहाँ ‘हलन्त’ का प्रयोग अशुद्ध है।) लगता है।

आप उच्चारण की दृष्टि से पहले ‘प्रत्युत्’ का उच्चारण करें, फिर ‘उत्पन्न’ का। आप अब दोनो को जोड़कर एक प्रवाहपूर्ण गति मे ‘प्रत्युत्पन्न’ उच्चारण करें। इस प्रकार आप शुद्ध उच्चारण करना सीख लेंगे। यह अभ्यास का विषय है।

प्रत्युत्पन्न को ‘प्रत्युपपन्न’ भी कहते हैं, जिसका सर्जन ‘प्रति’ और ‘उपपन्न’ के योग से होता है; ‘सृजन’ निरर्थक शब्द है। इसी ‘सर्जन’ के साथ (यहाँ ‘से’ का प्रयोग अशुद्ध है।) ‘वि’ उपसर्ग का योग होने से ‘विसर्जन’ शब्द की रचना होती है, ‘विसृजन’ की नहीं। जो लोग ‘सृजन’ को शुद्ध शब्द मानते-जानते आ रहे हैं, वे ‘विसृजन’ का प्रयोग क्यों नहीं करते? इस प्रश्न का उत्तर वे दे नहीं पाते।
एक स्वतन्त्र शब्द ‘प्रत्युत’ भी है, जिसका अर्थ ‘इसके विपरीत’ अथवा ‘बल्कि’ है।

शुश्रूषा :― द्वितीय शब्द ‘शुश्रूषा’ है। जब इस शब्द की वर्तनी से सम्बन्धित शुद्धतापूर्वक लेखन, उच्चारण तथा पहचान करने का प्रश्न किया जाता है तब बहुसंख्य विद्यार्थी और अध्यापकवृन्द ‘सुश्रूषा’ को ही शुद्ध मानते हैं। ऐसा इसलिए भी कि वे ‘सु’ को उपसर्ग मानकर ‘सुश्रूषा’ को उपयुक्त शब्द मान लेते हैं। आप पहले ‘शु’ (तालव्य श मे ह्रस्व उ) का उच्चारण करें; कुछ पल के लिए ठहर आयें, फिर श्रू (श्री वाले श्र मे दीर्घ ऊ की मात्रा) का उच्चारण करें; कुछ क्षण के लिए ठहर आयें, फिर ‘षा’ (मूर्द्धन्य ष मे आ की मात्रा) का उच्चारण करें। अब तीनो को मिलाकर प्रवाहपूर्ण उच्चारण करें।

यहाँ ‘शुश्रूषा’ के भिन्नार्थक शब्दों को जानना भी आवश्यक हो जाता है। आप अपने प्रयोग और भाव के अनुसार उसका अर्थ ग्रहण करेंगे। पहला और चर्चित अर्थ― ‘सेवा है; दूसरा― ‘सुनने की इच्छा’ को भी ‘शुश्रूषा’ कहा जाता है, जो कि आपके ‘एक वाक्य अथवा वाक्यांश अथवा अनेक शब्दों के लिए एक शब्द’ के रूप मे अर्थ प्रदान करता है; तीसरा― जो किसी के कहने के अनुसार सेवा की जाये, वह ‘शुश्रूषा’ है तथा चौथा अर्थ ‘चापलूसी’ है।

५९ :― तृतीय अंक है, आप जिसका उच्चारण करेंगे। वह ‘अंक ५९’ है, जिसमे उन’ और ‘सठ’ का योग है, इसलिए आप पूर्ण ‘उन’ का उच्चारण करेंगे और ‘सठ’ का भी। अब हम उच्चारण करते हैं― ‘उन’ और ‘सठ’। उन का अर्थ है, एक कम और सठ का अर्थ है, ‘साठ’; अर्थात् ‘साठ मे एक कम’, फिर हम शुद्ध उच्चारण करेंगे― ‘उनसठ’। आपने जैसे ही ‘उन्सठ’ का व्यवहार किया, उसमे प्रयुक्त ‘न’ अक्षर अर्द्धाक्षर के रूप मे दिखेगा। आप जब पूर्ण ‘उन’ का उच्चारण करेंगे तब ‘व्यंजन न्’ और ‘स्वर अ’ की ध्वनि उभरनी चाहिए। इसी प्रकार ‘उन्तीस’ के स्थान पर ‘उनतीस’ का उच्चारण शुद्ध है।

पोषकतत्त्व :― चतुर्थ शब्द है, ‘पोषकतत्त्व’। ‘तत्व’ निरर्थक शब्द है। ‘पोषकतत्त्व’ का अर्थ है, ‘पोषण करनेवाला तत्त्व’, जिसे आंङ्ग्ल भाषा मे ‘वाइटमिन’ वा (अथवा) ‘विटमिन’ कहते हैं, ‘विटामिन’ शब्दोच्चारण (शब्द+उच्चारण― अ+उ= ओ― गुण संधि) अशुद्ध है।

इसमे दो शब्दों का योग है, ‘पोषक’ और ‘तत्त्व’। प्राय: उच्चारणस्तर पर यह शब्द इसलिए अशुद्ध सुनायी देता है कि इसमे ‘मूर्द्धन्य ष’ जुड़ा हुआ है। आपको ‘ष’ का उच्चारण शरीर के महत्त्वपूर्ण अंग ‘मूर्द्धा’ की सहायता से करना होगा। बहुसंख्य विद्यार्थी और अध्यापकवृन्द इस ‘ष’ के स्थान पर ‘दन्त्य स’ का प्रयोग करते हैं; जैसे― ‘पोसक’ तथा यदि बहुत जानकार हुए तो ‘तालव्य श’ (पोशक) का व्यवहार करते हैं; परन्तु वस्तुत: उच्चारण के प्रति अँगुलियों पर दिखनेवाले सजग जन ‘मूर्द्धन्य ष’ (पोषक) उच्चरित करते हैं अथवा उच्चारित करते हैं। अब इसी के साथ लगे शब्द ‘तत्त्व’ को अधिकतर सुशिक्षितजन ‘तत्व’ लिखते हैं, जबकि ‘तत्त्व’ लिखना चाहिए। यह ‘तत्त्व’ शब्द ‘तत्’ और ‘त्व’ के योग से बना है, इसलिए ‘तत्त्व’ लिखा जायेगा और उच्चारण भी किया जायेगा। इसका उच्चारण है, ‘पोषकतत्त्व’/’पोषक-तत्त्व’। आप इसे लिखते समय ‘पोषक’ और ‘तत्त्व’ को मिलाकर लिख सकते हैं अथवा ‘पोषक’ और ‘तत्त्व’ के मध्य मे योजकचिह्न (-) लगाकर लिखेंगे। यदि आपने ‘पोषक’ और ‘तत्त्व’ को अलग-अलग लिखा तो आपका लेखन अशुद्ध माना जायेगा।

९५ :― पंचम भी ‘अंक’ है। वह अंक है, पंचानवे’। हमारे सुशिक्षित समाज का एक वर्ग इस अंक का उच्चारण ‘पचानबे’, ‘पिचानबे’ तथा ‘पिंचानबे’ करता है; उस कथित वर्ग से थोड़ा ऊपर दिखने-दिखानेवाला वर्ग ‘पंचानबे’ का व्यवहार करता है तथा जो उच्चारण के प्रति सचेष्ट और सतर्क वर्ग है, वह शुद्ध उच्चारण ‘पंचानवे’ करता है; परन्तु उनकी संख्या नगण्य है।

बहुसंख्यजन ‘नब्बे’ कहते हैं, जबकि उन्हें ‘नब्वे’ कहना होगा; क्योंकि अन्त मे ‘पवर्ग’ का ‘बे’ नहीं है, बल्कि ‘अन्त:स्थ ‘व’ का ‘वे’ है।

◆ वीणापाणि :― षष्ठ और अन्तिम शब्द है, ‘वीणापाणि’। ‘छठा’ और ‘छठे’ का तत्सम शब्द ‘षष्ठ’ है, न कि ‘षष्ठम’। यहाँ दो शब्द हैं, ‘वीणा’ और ‘पाणि’, जिसका शाब्दिक अर्थ है, ‘वीणा है, जिसके हाथ मे’। अब हमने उसका अर्थ और आशय सुस्पष्ट करते हुए, कहा है, ‘वह, जिसके पाणि (कर, हाथ) मे वीणा’ है। यह यहाँ ‘बहुव्रीहि’ समास का उदाहरण अथवा उस समास के विग्रह के रूप मे दिखता है।

अब यहाँ ‘वीणा’ और ‘पाणि’ मे प्रयुक्त ‘टवर्ग’ के पंचमाक्षर ‘ण’ पर विचार करते हैं। जैसा कि आप सभी को बताया और समझाया जा चुका है कि पंचमाक्षर ‘अनुस्वारयुक्त’ होता है, इसलिए इसका उच्चारण ‘ण’ होगा तथा जब ‘वी’ के साथ ‘णा’ और ‘पा’ के साथ ‘णि’ का योग होगा तब उनका क्रमश: उच्चारण ‘वीणा’ और ‘पाणि’ होगा। यह वही ‘पाणि’ है, जो ‘पाणिग्रहणसंस्कार’/’पाणिग्रहण-संस्कार’/’पाणि-ग्रहणसंस्कार’/पाणि-ग्रहण-संस्कार’ के रूप मे व्यवहृत होता है। सुशिक्षित समाज का एक वर्ग ऐसा है, जो ‘वीड़ापाड़ि’/’वीड़ापाड़ी’/’बीड़ापाड़ी’ का उच्चारण करता आया है और उस पर आश्चर्य यह कि व्याकरण के जानकार भी इसी तरह की अशुद्धियाँ करते आ रहे हैं।

◆ ‘आचार्य पण्डित पृथ्वीनाथ पाण्डेय की पाठशाला’ नामक कृति से सकृतज्ञता गृहीत।

(सर्वाधिकार सुरक्षित― आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; १८ जनवरी, २०२३ ईसवी।)