Interview : स्नातक निर्वाचन क्षेत्र लखनऊ की निर्दलीय प्रत्याक्षी कान्ति सिंह का विशेष साक्षात्कार

देश की दु:खियारी जनता की आह व्यर्थ नहीं जानेवाली

— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

जितने भी विपक्षी दल के नेत्री-नेता हैं, सभी हमारे लोकतन्त्र के लिए घातक सिद्ध हो चुके हैं। जैसे लक़्वाग्रस्त व्यक्ति क्रियाशील नहीं हो सकता, वैसे ही सभी विपक्षी राजनेताओं की स्थिति है। अब हमें उन सभी का एक सिरे से बहिष्कार करना होगा।

देश में किसानों की दयनीय स्थिति, शिक्षित बेरोज़गारों की शोचनीय दशा, महत्त्वपूर्ण कार्यालयों, विभागों का निजीकरण, नौकरियों को समाप्त करने का दुष्चक्र-कुचक्र, आतंकियों-द्वारा बेमौत मारे जा रहे हमारे जवानों की दुर्गति, महँगाई, स्वास्थ्य, शिक्षा, बढ़ते अपराध आदिक के प्रति मुखर होकर बोलनेवाला एक भी राजनीतिक नेत्री/नेता नहीं है और है भी तो वह स्वयं ‘आपराधिक कृत्यों’ में फँसा हुआ है। उसे भय है कि कहीं उसका विरोध ‘आत्मघाती’ सिद्ध हो जाये। इसी का लाभ देश की वर्तमान सरकार को चलानेवाले दो-चार लोग ले रहे हैं।

सच तो यह है कि सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व से उसी दल के अधिकतर विधायक और सांसद उद्विग्न हैं; खिन्न हैं तथा आक्रोशित भी। पिछले दिनों मेरी भारतीय जनता पार्टी के अनेक विधायक-सांसदों के साथ संवाद हुआ था। उन सभी नेतागण का मानना है कि देश की जनता के साथ छल किया जा रहा है। मन्दिर, भगवा, गाय, गोबर, हिन्दुत्व के मुद्दे के नाम पर जनसामान्य को भावनात्मक रूप से जोड़ कर उनकी भावना का शोषण कर, कथित भारतीय जनता पार्टी की स्वयंभू मोदी-सरकार अपना उल्लू सीधा करती आ रही है; ठीक यही स्थिति उत्तरप्रदेश के स्वयंभू योगी-सरकार की भी है। उत्तरप्रदेश में जिस तरह से युवावर्ग को परीक्षा, सेवा, नियुक्ति, भरती आदिक के नाम पर बेरोज़गारी के गर्त में धकेला जा रहा है; पक्षधरता और जातिवादिता के साथ अपराधियों का चिह्नीकरण कराया जा रहा है; बेहद ग़लत तरीक़े से सम्प्रदाय, जाति, वर्गादिक के आधार पर ‘राष्ट्रीय सुरक्षा क़ानून’ का निरंकुश होकर दुरुपयोग किया-कराया जा रहा है, वे सभी कारक सामूहिक रूप से उत्तरप्रदेश- सरकार के ताबूत में कील ठोंकते नज़र जा रहे हैं।

सत्तापक्ष के उन विधायकों का कहना था कि प्रधानमन्त्री-कोष के लिए उनसे बड़ी संख्या में धनराशि ली गयी थी; उनके वेतन-भत्ते से ३० प्रतिशत की कटौती की गयी थी। अब, जब प्रधानमन्त्री से पूछा जाता है कि कोष में कितनी धनराशि जमा है; जमा धनराशि का कहाँ और कितना प्रयोग किया गया है तब वे बताने से साफ़ मना कर दे रहे हैं। अब यह निरंकुशता बरदाश्त से बाहर की हो चुकी है। यह दुर्दशा भारतीय जनता पार्टी के भीतर की है, जो अन्तर्कलह के रूप में प्रकट होने लगी है।

‘न्यू इण्डिया’ निर्माण के नाम पर देश की जनता के एक-एक पैसा का इतना दुरुपयोग किया गया है कि जनसामान्य त्रस्त हो चुका है। सर्वसाधारण की आह और संवेदना उठने लगी है। वे व्यर्थ नहीं जानेवाली। जिस तरह से मनमोहन सिंह के नेतृत्व में काँग्रेस के शासनकाल में भ्रष्टाचार चरम पर पहुँचा था; जनता का दम घुटने लगा था, तब जनता ने ऐसी पटकनी दी थी कि वह अभी तक सँभल नहीं पायी है। उसी तरह से नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी का अन्तकाल सुनिश्चित है। इस स्वयंभू मोदी-सरकार ने अपनी अदूरदर्शितापूर्ण निर्णयों :– ‘नोटबन्दी’, ‘जी० एस० टी०’ तथा ‘लॉक-डाउन’ से देश की समूची अर्थ-व्यवस्था को ‘चट्’ कर लिया। संघटित और असंघटित, विशेषत: असंघटित क्षेत्र की आर्थिक स्थिति पूरी तरह से कथित मोदी-सरकार की जनघाती नीतियों-निर्णयों की भेंट चढ़ गयी।

अब, बचता है तो सिर्फ़ धिक्कार!

(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; ६ सितम्बर, २०२० ईसवी।)

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