समय की नाक पर क़दम-ताल करता गिद्ध!

एक अभिव्यक्ति

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
(प्रख्यात भाषाविद्-समीक्षक)

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय


पगडण्डियों पर जोड़-घटाना
गुणा-भाग करता हुआ पथिक,
जो समीकरण बना चुका है,
वह भीड़ की आँखों में
काँटा बन, खटक रहा है।
समय की नाक पर
क़दम-ताल करता गिद्ध :–
आश्वस्त है।
उसे भरोसा है,
अपनी निगाहों के चरित्र पर।
कल के सूरज का भविष्य बाँचता
उल्लू :–
अपने परों से
खरोंच-खरोंच
सत्यापित करता रहा है ,
एक नये ईमानदार विहान का।


(सर्वाधिकार सुरक्षित : डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, इलाहाबाद; १६ मई, २०१८ ई०)

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