संस्मरण– भाई बाबा

मेरे बाबा (दादा) का नाम श्री हौसिला बख्स सिंह था। लेकिन घर, गांव, जंवार के सभी लोग उन्हें ‘भाई’ के नाम से पुकारते और जानते थे। हम लोगों के लिए वह ‘भाई बाबा’ थे।

भाई बाबा, चार भाइयों में सबसे बड़े थे । हमारे यहां बैसवारा में कुछ समय पहले तक बड़े लड़के के पास कुछ विशेष अधिकार हुआ करते थे। शारीरिक श्रम वाले कार्य प्रायः बड़ा भाई नहीं करता था। मैंने ‘भाई बाबा’ को खेत में हल चलाते, कोन गोड़ते (फ़ावड़ा चलाते), गाय -भैंस का गोबर उठाते शायद ही कभी देखा हो। जमीन का बंटवारा भी चार भाइयों में उस समय 4:3:2:1 के अनुपात में होता था।

बड़े भाई की भूमिका , भाई की कम और पिता की ज्यादा होती थी। शायद इसीलिए बड़े भाई के पास जिम्मेदारियां भी सबसे अधिक होती थी। सभी छोटे भाइयों के बेटे- बेटियों की शादी- ब्याह करना, उनकी रिश्तेदारी में आना -जाना, बेटियों की विदा-विदाई करना, गांव -जंवार में शादी-ब्याह, मुंडन-छेदन में व्यवहार, उपहार देना बड़े भाई के की जिम्मेदारी हुआ करती थी।

इसके अलावा फसलों की बुवाई- कटाई के समय मजदूरों की व्यवस्था करना, चार बैलों की देखरेख करना, दो गाय- दो भैंस का दूध निकालना ‘भाई बाबा’ की जिम्मेदारी थी । जब तक सभी छोटे वाले बाबा खेत से वापस नहीं आ जाते, तब तक वह भोजन नहीं करते थे। देर कितनी भी हो जाए लेकिन दोपहर और रात का भोजन सभी भाई एक साथ चौका में बैठकर ही करते थे।

भाई बाबा ज्यादा पढ़े-लिखे नहीं थे, लेकिन कढ़े बहुत थे। दुनियादारी की उन्हें खूब समझ थी और वह पढ़ाई का महत्व भी खूब समझते थे। इसीलिए वह जरूर खेती- पाती में लगे रहे लेकिन अपने बच्चों को पढ़ने की हर संभव सुविधा प्रदान की। ईश्वर की भी ऐसी कृपा रही कि मेरे पापा सहित उनके पांचों बेटे सरकारी नौकरी पाने में सफल रहे।

जब वायुसेना में मेरी नियुक्ति का पत्र लेकर पोस्टमैन गांव आया था, तब भाई बाबा ने अपनी जेब से ₹20 उसे इनाम स्वरूप खुशी से दिए थे। मेरी नौकरी लगने के बाद भी भाई बाबा मुझे विदा करते समय कुछ रुपये चुपचाप मेरी हथेली में जरूर रख दिया करते थे। उनके पास न होते, तो पापा से मांग कर देते, लेकिन देते जरूर ।

शुरुआत के दो-चार साल तो मैं चुपचाप पैसे रख लेता था लेकिन एक बार मैंने हिम्मत करके कह ही दिया -” बाबा आप मुझे पैसे मत दिया करो। मैं खुद कमाता हूँ, मुझे पैसे नहीं चाहिए। आपका आशीर्वाद ही मेरे लिए बहुत है।”

तब भाई बाबा बहुत भावुक होकर बोले थे -” बेटा , मुझे पता है तुम कमाते हो। तुम्हें देने के लिए पैसे मेरे पास हैं भी नहीं। यह 10 – 20 रुपये जो तुम्हें देता हूँ, इसे मेरा आशीर्वाद ही समझो।”

फिर मैं निरुत्तर हो गया।

बाबा की पुण्यतिथि पर

(विनय सिंह बैस)
भाई बाबा के नाती