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सेनेटाइजर और मास्क फोबिया! कितनी हकीक़त कितना फ़साना?

क्या आपको लगता है कि ऐसे लोगों को कोरोना जैसी बीमारियाँ परेशान कर सकती हैं?

सन्त समीर जी (वरिष्ठ पत्रकार व प्राकृतिक चिकित्सक)

स्वामी विवेकानन्द जब अमेरिका गए थे, तब की एक घटना है। एक बार वे एक पार्क में अपने शिष्यों को वेदांत और राजयोग सिखा रहे थे। उसी दौरान खाना बनाते समय कुछ खाद्य नीचे गिर गया तो स्वामी जी ने ज़मीन से उठाकर उसे चाट लिया। इस पर उनकी एक शिष्या ने कहा—‘‘स्वामी जी, यह अच्छी आदत नहीं है। ज़मीन से उठाकर खाना ठीक नहीं, यह अच्छा मैनर नहीं है।’’ इस पर स्वामी विवेकानन्द ने कहा—‘‘यह अच्छी बात नहीं है! ठीक है, ठीक है। आप लोग मैनर का ख़याल रखो और मुझे अपने जीवन का आनन्द लेने दो।’’

सेनेटाइजर और मास्क फोबिया के इस दौर में उस घटना पर आप क्या कहेंगे? हमारे चिकित्सा विज्ञानी क्या सोचेंगे? क्या आपको लगता है कि स्वामी विवेकानन्द जैसे लोग आज होते तो कोरोना की चपेट में जल्दी आ जाते? असल में स्वामी विवेकानन्द को पता है कि किस तरह की ज़मीन पर वे बैठे हैं और किस स्थिति में उससे कितनी दूरी या नज़दीकी बनानी है। विवेकानन्द जैसों को हम समझ पाएँ तो यह भी समझ पाएँगे कि हमारी बहुत-सी समस्याएँ इस वजह से हैं कि हम ज़मीन से अपना रिश्ता भूल गए हैं।

एक और घटना।

क़रीब डेढ़ सौ साल पहले गुलामी के दिन और प्रयाग का सङ्गम तट। जाड़े के दिन थे। उजाली रात में नदी किनारे की रेत चमक रही थी। घोड़े पर सवार एक अँग्रेज़ अधिकारी गश्त पर निकला। अचानक उसने देखा कि एक सन्न्यासी नङ्ग-धड़ङ्ग रेत पर लेटा हुआ है। उसके आश्चर्य का ठिकाना नहीं। नज़दीक गया और बोला—‘‘स्वामी जी तुमको सर्दी नहीं लगती क्या?’’ सन्न्यासी मुस्कुराया और अँग्रेज़ की नाक को छूते हुए बोला—‘‘तुम्हारी नाक को सर्दी लगती है क्या?’’ अँग्रेज़ ने सफ़ाई दी—‘‘यह खुले में रहती है तो इसको अभ्यास हो गया है।’’ सन्न्यासी ने कहा—‘‘इसी तरह से मेरे पूरे शरीर को सर्दी सहने का अभ्यास हो गया है।’’

ये थे आर्य समाज के संस्थापक महर्षि दयानन्द सरस्वती।

क्या आपको लगता है कि ऐसे लोगों को कोरोना जैसी बीमारियाँ परेशान कर सकती हैं?

इस देश में पन्द्रह-बीस लाख साधु-सन्न्यासी हैं। तलाशते रहिए, पर इनमें ऐसे लोग न के बराबर मिलेंगे, जो कोरोना की वजह से मौत के शिकार हो गए हों। कोई केवल नाम का साधु हो तो बात अलग है। मैं तथाकथित सन्तों के विचार या व्यभिचार की बात नहीं कर रहा हूँ, पर जितने बड़े सन्त हैं, उनके शिविरों में कोरोना से मरने वाले नहीं मिलेंगे। स्वामी रामदेव और जग्गी वासुदेव के यहाँ तो सङ्क्रमण के शिकार भी न के बराबर मिलेंगे। कारण कि इनके आहार-विहार में कुछ पारम्परिक भारतीय तौर-तरीक़े हैं, जो इस तरह के सङ्क्रमणों से इन्हें बचाते हैं।

दुर्भाग्य से आज हम बस कहने को हिन्दुस्तानी रह गए हैं। हमारे जीवन में परम्परा के नाम पर कुछ कर्मकाण्ड भर बचे हैं। हवन नाम की एक छोटी-सी चीज़ का ही उदाहरण लीजिए। रोज़ हवन करने की बात छोड़िए, किसी पर्व-त्योहार पर हवन करेंगे तो उसमें भी देसी गाय का घी नहीं होगा। आधुनिक विज्ञानियों ने सिखा दिया कि हवन जैसी चीज़ों से नुक़सानदेह कार्बन डाई ऑक्साइड निकलती है और हमने इसे दकियानूसी मानकर छोड़ दिया। अब शोध हो रहे हैं कि कुछ ख़ास जड़ी-बूटियों और देसी गाय के घी से किए जाने वाले हवन का पेड़-पौधों के साथ ख़ास रिश्ता होता है; यह वातावरण में ऑक्सीजन स्तर सुधारने का कारण बनता है और कई तरह के सङ्क्रमणों से हमें बचाता है। घरों के भीतर की हवा में ड्रॉपलेट में मौजूद कोरोना वायरस से भी लोबान और गूग्गुल जैसी चीज़ों से किया गया हवन बचाव का काम करता है। हवन में जो चीज़ें शामिल होती हैं और जो उसका सही तरीक़ा है, उस पर ध्यान दें तो ज़मीन और पर्यावरण से मनुष्य का रिश्ता एकदम स्पष्ट समझ में आने लगता है।

मैं आँख मूँदकर किसी परम्परा की वकालत नहीं कर रहा हूँ। अगर भारत की हस्ती सदियों से क़ायम रहती चली आई है तो मैं उस वजह को समझने की बात कर रहा हूँ। मैं बस ज़मीन के साथ मनुष्य के रिश्तों की समझ बनाने की बात कर रहा हूँ। यह होगा तो धरती पर हरियाली बढ़ेगी, पर्यावरण ठीक रहेगा, प्रकृति अपने सम्पूर्ण वैभव के साथ मुसकराएगी। महामारियाँ और कुछ नहीं, महज़ इस बात का सङ्केत हैं कि हमने प्रकृति के वैभव को बचाने के बजाय मिटाने की साज़िश ज़्यादा की है।