गोस्वामी तुलसीदास की जयन्ती पर ‘सर्जनपीठ’ की विशेष प्रस्तुति

"तुलसीदास ने पथभ्रष्ट समाज को सन्मार्ग पर लाने के लिए लोकमंगलकारी उपदेश किया था"– डॉ० रागिनी

  ग्रह, राशि, नक्षत्र और ज्योतीषीय गणना के आधार पर ३१ जुलाई को गोस्वामी तुलसीदास के जन्म की तारीख़ ठहरती है। इसी अवसर पर 'सर्जनपीठ', प्रयागराज की ओर से 'जनकवि तुलसीदास के साहित्य मे लोकमंगलकारी तत्त्व'  विषयक एक आन्तर्जालिक राष्ट्रीय बौद्धिक परिसंवाद का आयोजन किया गया। 

  विषय-प्रवर्तन करते हुए, आयोजक और भाषाविज्ञानी आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय ने कहा,  "तुलसी-जैसा सार्वकालिक भक्त आज भी नहीँ दिखता; क्योँकि उन्होँने जिस लोकमंगलकारी सत्ता का निरूपण किया है, वह दुर्लभ है।इसका मुख्य कारण है, उनकी अपने अनन्य राम के प्रति निष्काम। श्री रामचन्द्र अपने भक्तवृन्द की महत्ता को स्वीकार करते हुए, कहते हैँ, "हम भक्तन के भक्त हमारे।" आज के परिवेश मे तुलसी के काव्य-वैभव की कल्पना तो की जा सकती है; उसकी सत्ता-महत्ता का अनुभव भी किया जा सकता है; परन्तु जिस समर्पण, श्रद्धा और विश्वास के साथ तुलसीदास ने अपने रचनाकर्म मे लोकमंगल का विस्तार दिखाया है, उसके समानान्तर कृति-प्रणयन का विचार भी करना, आत्मघाती है। इस दिशा मे जाने कितने प्रयास किये गये; उनकी अर्द्धालियोँ और दोहोँ को 'मिथ्यावाद' के घेरे मे लाने के प्रयास भी किये गये; परन्तु वैसे कृत्य करनेवाले समाज-द्वारा दुत्कारे गये।"

चित्रकूट से समाजशास्त्री और मुख्य अतिथि डॉ० रागिनी अवस्थी का मानना है, ''तुलसीदास ने अनुभव किया था कि दिग्भ्रमित समाज के लिए निर्गुण ब्रह्म का उपदेश व्यर्थ है। यही कारण था कि उन्होँने पथभ्रष्ट समाज को सन्मार्ग पर लाने के लिए मर्यादा पुरुषोत्तम राम की भक्ति का साधन अपनाते हुए, लोकमंगलकारी उपदेश किया था। उन्होँने व्यथित समाज की पुकार सुननेवाली तत्काल प्रकट होकर उसकी रक्षा करनेवाली एक सगुण-साकार ईश्वरीय सत्ता की आवश्यकता को गहराई से समझा था।''
    
डिण्डीगुल (थिण्डुक्कल), तमिलनाडु से आलोचक और प्राध्यापक डॉ० नवेन्दु शुक्ल ने अध्यक्ष के रूप मे कहा, "श्री रामचरितमानस और विनयपत्रिका मे ही तुलसी की भक्ति-भावना अभिव्यक्त हुई है। तुलसी की भक्ति दास्यभाव की भक्ति है, जो अपने प्रभु राम के प्रति पूर्णत: समर्पित थे। वे श्री रामचरितमानस के माध्यम से सुस्पष्ट घोषणा करते हैँ :– 'सेवक-सव्य'-भाव के बिना कोई व्यक्ति इस संसार-सागर से तर नहीं सकता।"
 
जामनगर, गुजरात से दर्शनविद् एवं कवयित्री डॉ० ज्ञानप्रिया ने विशिष्ट अतिथि के रूप मे बताया, "गोस्वामी तुलसीदास के काव्य का दार्शनिक आधार भक्ति है। उनका मानना है, संसार मिथ्या है और प्रभुशक्ति ही सत्य है; संसार के प्रति आसक्त होना, मोह है तथा प्रभु की ओर उन्मुख होना, प्रेम अथवा भक्ति है। कविता की दार्शनिकता का प्रतिपादन करते हुए, गोस्वामी जी ने ईश्वर, जगत्, संसार तथा जीव के स्वरूप और उनके पारस्परिक सम्बन्धोँ की विवेचना की है।"

अन्त मे, आयोजक ने सबके प्रति अपना आभार-ज्ञापन किया।