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‘चौकीदार चाचा’ के फराकी ठोकल माहँगा पड़ि गउवे

— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

ओकर बियहवा बिदेसे में कराई दीहल जाऊ का? आपन ओनिए रहि के फरियावत रही। काहें से कि जब देख तब, ओकरा गोड़वा में शनिचरे चढ़ल रहेले। हमरा इहो लागता कि ओ जनम में ऊ बिलायते में जनम लेले रहे। ‘मेरा साया’ फिलिम लेखा ओह जनम के ओकरो कवनो मेहरारू बिया; तबे नू, उ जइसे ए देसवा में आवेला त ओकरा कल ना पड़ेला। कबो हेने त कबो होने उधियाइल फिरे ला।

आच्छा त छोड़ीं। काँहे से हमरा पजरी आवे से चाचा छछून्हर बरावत फिरे ले। एसे कि ऊ झूठ के समुदर हवे। आ हमु उनकर कुल्हि गुनवा जाने लीं। ऊ एक नम्बरी हवे त हमहूँ दस नम्बरी हँयी।

इहे कुल्हि सोचत-साचत खेत आ डाँड़ार के नापत-जोखत हमु चलल जाति रहनी कि एगो आदिमी भेंटाइ गईल। ऊ पाठा आपना कान्हवाँ पर एगो बोरा लदले रहुवे। ऊ मरदा एगो लाल रंग के जाकिट आ खूब सूनर पाइण्ट पहिने रहुए। आ ओकर घड़िया खूब चमचमात रहुए। लागत त इहे रहुए कि केनो से झटक-झुटुक के ले आइल होखे। बुझात रहुए कि ‘अली बाबा चालीस चोर’ के सरदार हवे। फस किलास के सफ़ेद दाढ़ी में ऊ बाड़ा सुघर-साघर लागत रहुए। अपना गरदनिया में लाल आ हरियर रंग के गामछा लटकऊले रहुवे आ मुड़िया में गोलकी टोपिया पहिनले रहुए।

ओकरा काहला पर ओकरे कान्हवाँ पर से ओ बोरवा के उतारि दिहिंवीं। ऊ बाड़ा घबराईल लऊकत रहुवे। एही से हम ओकरा से पूछि दिहिंवीं, “का हो चाचा! तू के हव? अनेरिया गाइ लेखा केने से सवारी आव तिया?”

ऊ बतावे लगुवे, ” अरे! का-का बताईं तहरा के। हमार नाव ‘चौकीदार पँड़ित’ हवे। आ ए बबुआ! पहिले हमरा के दीसा-मैदान जाये खातिर कवनो नीमन उपाइ बताव?”

त हम कहनी, ” अरे चाचा! काँहें के अझुराइल बाड़। हऊ, जवन ऊखी के खेतवा लऊकत बा, ओही में घुसि के फराकी ठोकि आव।” एतना सुनते ऊ परदेसी चौकीदार चाचा फर्राटा मार के ऊखी के खेतवा में घुस गइलन।

आ एने हमरा दियानत में एगो चोर घुसि गईल रहे। काँहे से कि ओकर बोरवा तनी हिलत-डोलत रहुवे। हम ओकर बोरवा के खोले लगुईं। जरकिये देरिया में ओकर बोरवा में से हाँफत-काँपत ‘स्टारटप इण्डिया’ निकलुए; आ निकलते आपन परान लेके पेल परउवे। ओकरा बाद त लाइन लागु गईल रहुवे— ‘मेक इन इण्डिया’, ‘डिजिटल इण्डिया’, ‘स्मारट इण्डिया’ आ दूका-दूका इण्डिया निकले लगुअन स। आ एके झटका में सभ सई मीटर के दोड़ाकी लेखा भागे लगुअन स। आ ओ बोरवा पर चिपकावल रहुए एगो पोसटर, जेपर लिखल रहुए– नियू इण्डिया।

आ हम त उ कुल्हि गोड़ा के देखि के सकपकिया गईल रहुईं। आ ओहिजा बुदबुदाये लगुईं, “जय हनुमान ज्ञान गुन सागर। जय कपीस तिहुँ लोक उजागर।” काहें से कि हम डेराई गईल रहनी। फेर सोचे लगुईं– आहि ए दादा! ऊ बुढ़वा आई त आपन खलिहा बोरवा देखि के हमरा के ना मालूम का-का कही। एतना बतिया आवते, हमार माथा ठनकि गईल। हमार मन एगो जोरदार राहता निकालु देहलसि। आ ऊ की एही लगली झाड़ा फीरे के बहाना तेहूँ निकलि जाऊ। आ बुढ़वा पूछी त बता दीहे की हमहूँ दीसा-मैदान गईल रहनी हाँ। एतना नीमन उपाइ के हमु हथवा से ना जाए दिहनी। एही से ओही लगिए नहरी के नीचे उतरि के आ चुपियाई के बईठि गईनी। आ जेने खलिहा बोरवा रखल रहुवे, ओनिए कनखियाइ के देखत रहुईं।

ओतने में ऊ बुढ़वा ओहिजे चहुँपल रहुवे। आ एने-ओने देखत रहे। आ पाँचु मिनट के बाद ओहिजे हमहूँ चहुँप गईनी।

हामरा के देखते लाल-पियर मुँहवाँ बनाई के ऊ खिसियाई गईल। पूछे लगुए, ” तू हामार ई बोरवा खोलले रहल हा का?”
त हम ओकरा के साफ जबाब दे दिहुँई, “भे मरदे! इ तू का कह तार। एने तू गईल हा, आ ओने हम गईनी हाँ। हमरो नू फराकी ठोके के रहल हा। काँहें के मनवाँ थोर कईले बाड़े? चल हामरा घरे। तहरा पनपियाऊ देब आ एगो नीमन बोरवो।

एतने में, ऊ रोवे लगुवे आ सुकुर-सुकुर के कहे लगुवे, “ई कवनो अईसन-वईसन बोरा ना रहल हा। एमे हमार छव साल के कमाइल धन रहल हा। ए बोरा में ऊ-ऊ चिजिउवा रहल हा, जेकरा के देखाई-देखाई के एईजा (भारत) के लोगवा के पिछलका छौ सालि से बुरबक बनाइ के बझवले रहली हाँ। अब त हमरा पासे दोसर कवनो आइटमे नइखे।”

एतना में, हमार बुचिया हमरा के हिलाई-डोलाई के जगाई दिहुए, आ हम चकचोन्हर लेखा एने-ओने देखत रहि गइनी।
एही से नू कहल जाला– सपना ना होखेला अपना।

(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; २७ जून, २०२० ईसवी)

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