‘शिक्षक-दिवस’ पर विशेष टिप्पणी : “शिक्षे! तुम्हारा नाश हो”

भाषाविद्-समीक्षक डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय-

आज ९९ प्रतिशत गुरु कुटिल बन चुके हैं। वहीं पूर्व के गुरु, जो जीवन-मूल्यों की ‘कल’ तक रक्षा करनेे के लिए प्राण-पण से तत्पर रहते थे और अपने शिष्यवृन्द को भी चैतन्य करते रहते थे, आज ‘कापुरुष’ हो चुके हैं। ऐसे गुरुगण ‘जैसा चल रहा है, वैसा चलने दो’ की नीति के पक्षधर बने हुए हैं। ऐसा इसलिए कि उन सबने अपना जीवन-यापन कर, ‘आदर्श’ का आवरण ओढ़ लिया है। उन्हें ‘कल के कर्णधार’ के ‘कल’ की चिन्ता नहीं है। शिक्षण-संस्थानों के ‘बॉस’ के चरण चाटते रहो और अपने अन्तर्गत आनेवाले सहयोगियों पर धौंस जमाते रहो, आज अधिकतर अध्यापक इसी चरित्र को जी रहे हैं। यही कारण है कि शिक्षा गौण हो चुकी है और ‘बॉस’ प्रधान हो चुका है।

सच तो यह है कि आज शिक्षा ‘बाज़ार’ का रूप ले चुकी है, जहाँ अधिकतर अयोग्य, अज्ञानी, अनभिज्ञ लोग ‘सौदेबाज़ी’ करते हुए दिख रहे हैं। तरह-तरह के ‘कोचिंग बाज़ार’ की निर्मम व्यवसायिकता ने विद्यार्थियों को ऐसा ‘दिव्यांग’ बना दिया है कि न ‘दिव्य’ दिख रहा है और न ही ‘अंग’ का अता-पता है; लक्षित हो रहा है तो पराश्रित भाव। सभी ‘कोचिंग बाज़ार’ विद्यार्थियों को परजीविता की ज़िन्दगी जीने के प्रति अग्रसर कर रहे हैं। ऐसे में, हमारे विद्यार्थियों के मौलिक चिन्तन के स्रोत शुष्क पड़ गये हैं, जो कि शोचनीय स्थिति है।

(सर्वाधिकार सुरक्षित : डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; ५ सितम्बर, २०१९ ईसवी)

url and counting visits