Exclusive coverage of IV24 : प्रतापगढ़ डीएसपी (CO) की अवनीश मिश्र से विशेष वार्त्ता

अपने को बुद्धिजीवी माननेवालो!

— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

बेशक,
तुम्हारे चिन्तन चुराये हुए हैं।
किराये की कोख से जन्मे
या फिर परखनली में उपजे
तुम्हारे वे शब्द हैं,
जिन्हें पक्षाघात ने जकड़ लिया है।
कोई थिरकन नहीं?
प्रतिक्रिया-रहित संवेदना-शून्य
तुम्हारा शब्द-जगत!
कबाड़ख़ाने से उठाकर
लायी गयी लेखनी
विकृत संसार की
अधूरी और पूर्वग्रहपूर्ण
विसंगतियाँ तो लिख सकती हैं।
लिख सकते हो तो लिखो–
उससे ख़ुद की लाचारी,
स्वयं का अधूरापन।
तुम्हें ग़लतफ़हमी है,
अपनी सामर्थ्य पर।
तुम्हारी लेखनी बिक जाती है
पद और पुरस्कार की चाहत में।
बन्धक हैं, तुम्हारे आक्रामक तेवर
और तुम्हारी सत्ता-महत्ता
क़ैद है स्वार्थ की मुट्ठियों में!
आज़ाद करा सकते हो?
आज़ाद हो सकते हो?
मुक्त कर सकते हो,
अर्गला से जकड़े अपने पाँवों को?

(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; २९ जून, २०२० ईसवी)

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