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पढ़े-लिखे लोग का ज़िन्दा रहना किसलिए?


★ आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

“पत्रकारिता की भाषा ‘आम आदमी’ की हो।” एक कथोपकथन (संवाद) के दौरान प्रतिष्ठित पत्रकार प्रभाष जोशी जी ने कभी मुझसे कहा था। पत्रकारिता की भाषा आम आदमी की हो और सरल हो। मैं पूरी तरह से सहमत हूँ कि पत्रकारिता की भाषा जन-सामान्य (आम आदमी का प्रयोग पूर्णतः ग़लत है।) की होनी चाहिए और सरल भी।

अब प्रश्न उठते हैं— जनसामान्य की भाषा की परिभाषा क्या है ? भाषा की सरलता से आशय क्या है ? समाचारपत्रों का नामकरण करते समय जनसामान्य की भाषा और सरलता पर विचार किया जाता है? ‘भास्कर , जागृति, आर्यावर्त्त, ब्लिट्ज, चिरन्तन, समवाय, प्रहारिका, इति, पाञ्चजन्य, सारिका, वनिता, नीहारिका, जाह्नवी, यथावत्, वागर्थ, शीर्षान्तर, कलिका, इंडिया टुडे, आउटलुक, कॉम्पैक्ट, आई नेक्स्ट, दैनिक ट्रिब्यून, सत्ता-प्रहरी, विभंजन, प्रभंजन, धनुष्टंकार, प्रवेदिका, शलाका, मनोरमा आदिक लाखों नामों को आप जनसामान्य की भाषा कहेंगे? सरल भाषा कहेंगे? यदि नहीं तो क्या कहेंगे? इस देश के कितने पढ़े-लिखे-कढ़े लोग उक्त नामों के ‘अर्थ’ जानते होंगे? जब पढ़े-लिखे-कढ़े लोग हाथ खड़े कर देंगे तब सामान्य और अति सामान्य लोग की स्थिति क्या होगी, इसे समझना और समझाना बहुत आसान है।

अब आइए! हिन्दी-समाचारपत्रों के समाचारों के शीर्षकों पर विचार करते हैं :—- हर्ष फायर किया गया; सुप्रीम कोर्ट ने डिसीजन लिया; हॉस्पिटल में उसका पीएम हुआ; मिस यूनीवर्स contest inagurated; डॉ. पी. एन. पांडेय Awarded; Student Selected for आइएएस; आयोजन कैंसिल किया गया; प्रत्यर्पण किया गया; समलंकृत किया गया; समादृत किया गया; उनका उद्बोधन था; प्रैक्टिकल Exams. आरम्भ; नवाचार पर उन्होंने टिप्पणी की; केस डिसमिस किया गया आदिक। और भी :– दो दिनी समारोह शुरू; चोरी के रुपये आरोपियों ने खरच डाले; बदमाश धराये गए; क़ैदी जेल में फांसी पर लटका पाया गया; आरोपी वैज्ञानिक फांसी पर झूल गया; १४ साल की साइंटिस्ट युवती से २५ साल के अधेड़ ने सामूहिक रेप की; ४५ साल की बूढ़ी औरत को जीवित बचा लिया गया; प्रेमी प्रेमिका के साथ फुर्र; ट्रैक्टर पर मृतक सवार थे आदिक।

ये सभी उदाहरण मात्र ‘उदाहरण’ नहीं हैं, बल्कि समाचारपत्रों में प्रयोग की गयी भाषा है, जिन पर देश के सभी प्रबुद्धवर्ग की स्वस्थ वैचारिक भागीदारी होनी ही चाहिए; किन्तु स्वनिर्मित रोटी-दाल की समस्याओं से हमारा बुद्धिजीविवर्ग आक्रान्त रहता है या फिर स्वयं को ‘तटस्थ’ बनाये रहने-रखने की ‘नौटंकी’ में माहिर दिखता है। यही कारण है कि आज अधिकतर समाचारपत्रों में ऐसे अक्षम्य भाषिक प्रयोग बेरोक-टोक किये जाते आ रहे हैं। पढ़े-लिखे और ऊँचे-ऊँचे पदवीधारक लोग में इतनी भी दक्षता नहीं कि ‘कुभाषा-मार्ग’ पर बढ़ रहे लोग को ‘सुभाषा-मार्ग’ की ओर मोड़ सकें। यहाँ पर प्रश्न हैं– ऐसे लोग की ‘शिक्षा का उद्देश्य’ क्या था? मात्र अपने और अपने परिवार का ‘पेट-भरण’ (उदरपूर्ति)? खोखले समाज में अपनी कुटिल और कुत्सित मनोवृत्ति का प्रदर्शन? तो ऐसे आत्मकेन्द्रित लोग को बार-बार धिक्कार है!

अपना और अपने कुटुम्ब का पेट तो एक ‘कुत्ता’ भी भर लेता है, इधर-उधर मुँह मारके।

(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; ३० जून, २०२१ ईसवी।)