Interview : स्नातक निर्वाचन क्षेत्र लखनऊ की निर्दलीय प्रत्याक्षी कान्ति सिंह का विशेष साक्षात्कार

“ताँत बजी और राग बुझा”

— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

ताँत के बजते ही राग की अनुभूति होने लगती है। इसे रेखांकित करता है, सत्य और मिथ्या का मंच— ‘मुक्त मीडिया’ अर्थात् ‘सोशल मीडिया’।

अनौचित्य की स्थापना करते हुए जब ‘वाहवाही’ के अर्थहीन प्रलाप का चक्र चलना आरम्भ होता है तब कहना पड़ता है, ”ताँत बजी और राग बुझा।”

देश में कुछ लोग की वाणी का चमत्कार ”ताँत बजी और राग बुझे” कहावत को चरितार्थ करता है। यहाँ ऐसे भी लोग हैं, जो धर्म-कर्म-योग के प्रति जनाभिरुचि उत्पन्न करते रहे और देखते-ही-देखते “अँगुली पकड़ कर पहुँचा” पकड़ना को सिद्ध करते हुए, अपना आर्थिक साम्राज्य स्थापित करते रहे हैं; राजनीति के मैदान में कभी नितान्त निरीह और ‘अदना’ रहे लोग आज सम्पूर्ण देश को अपनी अँगुली पर नचा रहे हैं और “अपने मियाँ मिट्ठू” बनते हुए, देश की जनता के रुपयों पर ऐश करते हुए, देश-देशान्तर ‘उड़न खटोला’ में पलथी मारकर उड़ रहे हैं। ऐसा इसलिए कि भारत की मिट्टी है ही ऐसी, जिसका आधार ही ‘विश्वासघात’ का रहा है। अनार्य, शक, हूण, यवन, तुर्क, मुग़ल, अँगरेज़ आदिक ने इस देश की मिट्टी में विश्वासघात के बीज बोये थे, जिनके अंकुरण के श्रेय “एकोहम् द्वितीयोनास्ति” को चरितार्थ करते हुए, “आँखों में सरसों फुलाते” आ रहे हैं। यही कारण है कि फूट की अमरबेलि यत्र-तत्र-सर्वत्र लक्षित हो रही है, जिसके पीछे एक ही उद्देश्य है, “अपनी-अपनी ढपली-अपना-अपना राग”, जो लोकतन्त्र को मुँह चिढ़ा रहा है। देश में जो सत्ता-पिपासु रहे हैं, वे सत्ता-प्राप्ति के लिए देश को जाति-वर्ग-धर्म-पन्थ-सम्प्रदाय आदिक में विभाजित कर, चक्रवर्ती सम्राट बनाने का “दिवा-स्वप्न” देखते आ रहे हैं; क्योंकि वे “आँधी के आम” को दोनों हाथों से “आँखें मैली” करते हुए बटोरने में सिद्धहस्त हैं।

“आँखों की किरकिरी” होते हुए भी कुछ लोग यहाँ “अपना उल्लू सीधा” करते आ रहे हैं; परन्तु “अपनी खिचड़ी अलग पकाने” के कारण जनसामान्य “अपना-सा मुँह लेकर रह” जाता है और अत्याचारी इतने धृष्ट हैं कि “अपनी नींद सोते हैं और अपनी नींद जगते” हैं। जैसे अँगरेज़ नहीं चाहते थे कि भारतीय “अपने पैरों पर खड़े हों” वैसे ही हमारे काले अँगरेज़ नहीं चाहते कि आज़ाद भारत की जनता “आकाश-पाताल करते” हुए प्रगतिपथ पर अग्रसर हो। यदि ऐसा नहीं है तो देश की जनता से प्रत्यक्ष-परोक्ष इतने प्रकार के ‘कर’ लिये जाते हैं, जिनसे सभी ख़र्च को निकाल देने पर भी इतनी धनराशि बची रहती है, जिससे “हर हाथ को काम” मिल सकता है; किन्तु हमारे शासक “ऊँट की चोरी निहुरे-निहुरे” को साबित करते आ रहे हैं।

देश की जनता “अपने पैरों पर ही कुल्हाड़ी मारती” आ रही है, अन्यथा “ऐरे-गैरे नत्थू खैरे” महापौर, विधायक, सांसद आदिक बन कर हमारी “छाती पर मूँग” नहीं दल रहे होते। जनसामान्य “एड़ी-चोटी का पसीना एक” कर रहा है और बदले में उसे क्या हासिल हो रहा है? चुनाव के समय जब खद्दरधारी भाषण करते हैं तब देश की जनता का “आसमान के तारे” दिखाते हैं और चुनाव जीत जाने के बाद “थूक कर चाटते हुए” दिखते रहते हैं। देश की जनता जब तक “सीधी गाय” बनी रहेगी तब तक देश की जनता “लाभ के पाँव” पर नहीं लोट सकेगी।
आज केन्द्र और राज्यों से उठ रही ज़ह्रीली हवा से लगभग सभी परेशान हैं। सभी सरकारें “शतरंज के मोहरें मिलाती” नज़र आ रही हैं। सुरक्षा, महँगाई, भ्रष्टाचार, बेईमानी, असमानता, ढकोसला, बेरोज़गारी, किसान-उत्पीड़न, नारी-अपमान आदिक विषय आज अत्यन्त संवेदनशील हो चुके हैं। इसके बाद भी “शर्म से गड़ते” नहीं। सभी “हमारी बिल्ली हमसे ही म्याऊँ” करती आ रही हैं; क्योंकि क्या पक्ष, क्या विपक्ष, सभी “हवा के रंग देखकर” काम करते आ रहे हैं। वास्तव में, आज देश की दशा अत्यन्त शोचनीय हो चुकी है। ऐसे गर्हित लोग को नहीं भूलना चाहिए,”कभी नाव गाड़ी पर तो कभी गाड़ी नाव पर।” एक बात और, “काजल होय न सेत चाहे सौ मन साबुन धोय।”

(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; २६ अगस्त, २०२० ईसवी।)

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