राजनेताओं का बड़बोलापन खुली गुण्डागर्दी है ?

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
(प्रख्यात भाषाविद्-समीक्षक)

सूत्रधार-संयोजक : डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय


——० परिसंवाद-आयोजन०——


अभी हाल ही में देश के प्रधान मन्त्री नरेन्द्र मोदी पर काँग्रेस की ओर से की गयी ट्वीट अति निन्दनीय है और बीभत्स भी, जिसकी ‘मुक्त मीडिया’ भर्त्त्सना करता है। नरेन्द्र मोदी की ग़लत नीतियों का विरोध तो किया जा सकता है; करना भी चाहिए परन्तु सीधा गर्हित आक्षेप नहीं करना चाहिए। किसी भी प्रकार के व्यक्तिगत आरोपण के हम.कठोर विरोधी हैं; वहीं चुनाव-प्रचार करते समय देश के प्रधान मन्त्री नरेन्द्र मोदी को भी शालीनता के साथ अपने विचार प्रकट करने होंगे, जो कि अभी तक दिखा नहीं है; कम-से-कम अब तक देश के पूर्व-प्रधान मन्त्रियों ने जिस गरिमा की रक्षा करते हुए सार्वजनिक मंचों से जनसामान्य को सम्बोधित किया है, उसकी वे रक्षा तो करें।
आश्चर्य है, इन दिनों ‘सत्ता’ की राजनीति का इतना क्षरण हो चुका है कि किसी भी नेता पर कहीं-कोई नियन्त्रण नहीं है। विषय जब गम्भीर रूप लेने लगता है तब सम्बन्धित राजनीतिक दलों के बिचौलिये यह कहकर अपना पल्ला छुड़ा लेते हैं : यह ‘उनका’ व्यक्तिगत विचार है; पार्टी से उसका कोई लेना-देना नहीं है।
अभी तक ऐसे छल-छद्मी, बहुरुपिये नेता आपस में और विरोधी दलों पर आरोप-प्रत्यारोप करते आ रहे थे; आ रहे हैं परन्तु अब ये देश की जनता को भी धमकाने लगे हैं। ऐसे कुत्सित विचार प्राय: सत्ताधारियों की ओर से ही आ रहे हैं, जो निस्सन्देह उनकी अहम्मन्यता का द्योतक है। नेता बने ऐसे गाँठ बाँध लें, देश की जनता जब जागती है तब बहुतेरों के गर्व को ‘खर्व’ कर देती है।
बिहार का एक बड़बोला नेता कहता है : अगर कोई प्रधान मन्त्री नरेन्द्र मोदी की बुराई करेगा तो उसकी हम अँगुली तोड़ देंगे और हाथ काट लेंगे। फिर जब उसके इस वक्तव्य का संज्ञान लेते हुए, विपक्षी और जनप्रतिनिधि आक्रामक होते हैं तब वह अपनी बत्तीसी निकालते हुए कहता है, “मैंने तो इसे मुहावरा के रूप में कहा था।जैसे : मुहावरा है— उँगली दिखाना।”
गोरखपुर का एक विधायक कहता है : जिसने भी भारतीय जनता पार्टी के प्रत्याशी को वोट नहीं दिया तो वह अंजाम भुगतने के लिए तैयार रहेगा।
ऐसे में, सहज ही अनेक प्रश्न उठते हैं : हमारे ऐसे नेता अब ‘गुण्डा’ बनते जा रहे हैं? देश के मतदाता किसके पक्ष में मतदान करेंगे, यह ‘टुटपुँजिये’ नेता निर्धारित करेंगे? धमकीभरे स्वर में सार्वजनिक मंच से बाध्यतापूर्ण ऐसा आदेश करने का अधिकार क्या देश के नागरिकों के मौलिक अधिकारों का हनन् नहीं है? क्या ऐसा आदेश ‘राजनीतिक फ़त्वा’ नहीं है? ऐसे सिरफिरों के लिए किस प्रकार के उपचार की आवश्यकता है?
इन दिनों देश के सारे राजनीतिक दलों में ‘बड़बोले’ भरे हुए हैं। देश के मतदाता किसके पक्ष में मतदान करते हैं; नहीं करते हैं, ये अधिकार मतदाताओं का नितान्त संवैधानिक और निरापद है; इसपर किसी भी राजनीतिक दल का कहीं-कोई हस्तक्षेप नहीं है।
उक्त प्रश्नों पर आपके मत-सम्मत क्या हैं? मुक्त भाव के साथ आपके शालीन, सकारात्मक तथा पूर्वग्रहरहित विचार आमन्त्रित हैं। व्यक्तिगत आक्षेप नहीं करें; नीतियों पर पर प्रहार करें। मात्र विषय-केन्द्रित तार्किक-ताथ्यिक संवाद का स्वागत है। यहाँ प्रश्न-प्रतिप्रश्न, उत्तर-प्रत्युत्तर भी किये जायेंगे; दिये जायेंगे।


बद्री पाण्डेय- चुनाव प्रचार के दौरान राजनेताओं को व्यक्तिगत आक्षेपों से बचने चाहिए, मगर सभी दलों के चुनाव प्रचारक एक ही रंग में रंगे हुए लगते हैं। राजनीतिक मर्यादा का तो मानो लोप ही हो गया हो। सब एक से बढ़कर एक। बहती गंगा में सब हाथ धोने को तैयार हैं, कहीं कोई मौका न छूट जाए वाली कहावत बिलकुल सटीक बैठ रही है। पहले से ठान बैठे हैं कि विरोधी दलों के नेताओं का विरोध करना ही करना है, भले ही वह सही क्यों न हो।

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय- बद्री पाण्डेय जी! ऐसे में जब सामान्य जनता इन नेताओं को गाली देती है तो क्या बुरा करती है?

बद्री पाण्डेय- सर गाली दे लेने से अब बात नहीं बनने वाली। जन सामान्य की भावनाओं को नजरअंदाज या भेदभाव करने वाले राजनेताओं को सबक सिखाने का समय आ गया है। इसके बिना इनकी सोच बदलने वाली नहीं है। राजनेताओं की नजर में आम लोगों की अहमियत एक रोटी के टुकड़े से ज्यादा नहीं आंकी जाती। क्योंकि इस समुदाय में न तो कभी एकजुटता रही और न ही भविष्य में उम्मीद की जा सकती है। इसी का फायदा राजनीतिज्ञ उठा रहे हैं। नहीं तो जन सामान्य लोगों में प्रतिभा और हुनर असाधारण रूप में देखने को मिलती है। सही समय पर सही मंच न मिलने से प्रतिभा का ह्रास होने लगता है। इसके बाद प्रतिभा के धनी लोग लालच के वशीभूत होकर अपने गंतव्य से विमुख हो जाते हैं। इसी का फायदा राजनेताओं को मिलने लगता है। ऐसे समय में आप जैसे महानुभाओं के सानिध्य की बेहद जरूरत होती है। ऐसा मेरा मानना है। चूंकि आप बिना लाग-लपेट के सहज अंदाज में सच्चाई कह देते हैं, जिससे लोगों का अंतःकरण स्वतः बदलने लगता है। मौजूदा समय में आपकी एक पथ-प्रदर्शक के रूप में बेहद जरूरत महसूस की जा रही है। आप ऐसा कर भी रहे हैं। यही वजह है कि हमारे जैसे लोगों का इस बीच खासा मनोबल बढ़ा है। सर आपके संपर्क में आये अभी मुझे कुछ ही दिन हुए हैं, मगर मुझे काफी खुशी होती है कि मैं आप के मार्गदर्शन में हूं । क्योंकि आपसे मैं बहुत कुछ सीख रहा हूं ।

रवीन्द्र त्रिपाठी- मत कहो आकाश में कुहरा घना है यह किसी की व्यकतिगत आलोचना है दुष्यंत कुमार जी याद आते हैं आज ।

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय- रवीन्द्र त्रिपाठी जी! शेरो शायरी से स्वयं को अलग कर यथार्थ पर टिप्पणी कीजिए।
आपका अर्थ यह कि हमारी लोकतन्त्रीय मर्यादा पर बलाघात हो और हम ‘गांधी जी के तीन बन्दर’ साबित होते रहें?

रवीन्द्र त्रिपाठी- पांडेय जी हमाम में सब नंगे हैं श्रद्धेय को बड़ छोट कहत अपराधू ।

एसपीएस राजन- जिस भाषा शैली और निजी स्तरहीन हमलों का चलन मोजी करते आ रहे हैं अभी तो उनको जवाब ही नहीं दिया गया है । उम्मीद करता हूँ भविष्य में जरूर मायावी आडम्बर पर सार्थक प्रहार होगा ।

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय– राजन जी! निस्सन्देह, एक प्रधान मन्त्री अपनी ही मर्यादा तार-तार कर रहा है और अन्य नेताओं को गर्हित संवाद करने के लिए प्रेरित कर रहा है। ऐसे में, प्रधान मन्त्री को उसके पद की गरिमा का अनुभव कराने के लिए हम किसी विकल्प पर विचार कर सकते हैं?

घनश्याम अवस्थी- नेता लोग सेवा करने के लिए इतने आग्रही क्यों हैं कि मतदाता तक को धमकाने लगे ? क्या सेवा करने के अलावा इन्हें कुछ भी नहीं आता ? वाह रे सेवा-भाव !

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय- अवस्थी जी! हम ऐसे नेताओं को कब तक कोसते रहेंगे? ऐसे नेताओं के राजनीतिक जीवन कैसे समाप्त कर दिया जाये, इस दृष्टि से हम क्यों नहीं विचार करते? एक स्वर में देश की जनता ऐसे बड़बोलों के विरुद्ध अपना मोर्चा क्यों नहीं खोलती?

घनश्याम अवस्थी- नियोजित जनजागरण द्वारा देश की भोली जनता को उसका हक़ बताना होगा। सरकारें मनोयोग से यह कार्य करने से रहीं। यह कार्य अब उनकी प्रतीक्षा में है जो समाज को लुटते-पिटते नहीं देख पा रहे हैं और मार्गदर्शन करने में सक्षम हैं। गुरुदेव ! [ ………….हो कहीं भी आग लेकिन आग जलनी चाहिए – दुष्यन्त ]

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय- मुझे लगता है, जिस तरह से साहित्यिक, सांस्कृतिक, सामाजिक आदिक संस्थाएँ आयोजन करती हैं उसी तरह से ऐसे नेताओं को पाठ पढ़ाने के लिए सम्पूर्ण देश में संस्थाविशेष का गठन कर उन पर प्रहार करना होगा।

घनश्याम अवस्थी- बिलकुल । लोकतंत्र को स्वस्थ रखने के लिए सतत निदान और उपचार आवश्यक है ।

एड. विनय पाण्डेय- राजनीतिक बयानबाजी का स्तर गिरता जा रहा है ।

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय- पाण्डेय जी! क्यों गिरता जा रहा है? उसके लिए देश की जनता दोषी नहीं है?

अनिवेर्ति तिवारी– सर कोई भी व्यक्ति तब तक सीधा एवं सज्जन है जब तक कि उसके पास सामर्थ्य (शक्ति ) नहीं है l इसमें व्यक्तिगत दोष के साथ-साथ कुछ समाज का भी दोष है क्योकि समाज ही ऐसे व्यक्तियों को योग्यता को ध्यान न देकर -जाति,धर्म ,सम्प्रदाय के आधार पर चुनती है तो ऐसे लोगो से क्या अपेक्षा की जा सकती है और दूसरी बात गुरुदेव गम्भीरता बिना ग्यान के नहीं आ सकती l
इन्हे अपने पद की गरिमा एवं महत्व का ही नहीं पता, सर मुझे अब तो लगता है की चुनाव लड़ने वाले प्रत्याशियो की एक निश्चित योग्यता निर्धारित कर देना चाहिए एवं आपराधिक व्यक्तियों को कठोरता के साथ प्रतिबन्ध लगाया जाना चाहिए

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय- अनिवेर्ति जी! आपने बहुत ही गम्भीरतापूर्वक अपना विचार व्यक्त किया है। इन नेताओं के बड़बोलेपन को बढ़ावा देने के लिए समाज किन रूपों में दोषी है? उन दोषों को कैसे दूर किया जा सकता है? आप ‘निश्चित योग्यता’ का निर्धारण कैसे करेंगे?

अनिवेर्ति तिवारी- गुरुदेव सम्प्रदायवाद, जातिवाद, क्षेत्रवाद, धर्म आदि के आधार पर किसी दल या नेता का चुनाव करना ही समाज का दोष है l चुनाव करते समय इन बिन्दुओ का परित्याग करना होगा l
गुरुदेव जैसे आप एक योग्य व्यक्ति हैं इसी तरह कुछ लक्षणो के आधार पर योग्यता की पहचान की जा सकती है ज़िसे आप अच्छी तरह जानते हैं मुझे बताने की आवश्यक्ता नहीं है सर

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय- अनिवेर्ति जी! आशा की जा सकती है, आपके रचनात्मक विचारों, सुझावों से देश के नेताओं का मन-परिवर्त्तन होगा।

अनिवेर्ति तिवारी- आभार सर ।

जगन्नाथ शुक्ल- राजनीति सत्ता केन्द्रित हो गई है और राजनेता का कोई मानदण्ड नहीं रह गया है, भाषा शैली के गर्हित होने की कोई सीमा नहीं रह गई है।

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय शुक्ल जी! हमारे प्रश्न ये नहीं हैं। प्रश्नों को समझते हुए प्रतिक्रिया करें।

जगन्नाथ शुक्ल- जी गुरुदेव….

सत्यम गुप्त “युवा”- एक प्रधानमंत्री के बारे में ऐसी सोच रखने वाली पार्टी जो पिछले साठ सालों से भारत जैसे देश पर राज करती आई है ।
उनके द्वारा की गई ये हरकत बहुत ही शर्मनाक विषय है । इस पर केंद्र सरकार को कठोर कार्यवाही करनी चाहिए । क्योंकि प्रधानमंत्री किसी एक का नही पूरे राष्ट्र का प्रधान होता है ।

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय- गुप्त/गुप्ता जी! कहा गया है : जैसा मार्ग हमारे बड़े-बूढ़े दिखाते हैं, छोटे भी बिना सोचे-समझे उस पर चल पड़ते हैं।
हमारे प्रधान मन्त्री दाँत पीसते हुए जिस बौखलाहट के साथ चुनावी जनसभाओं में ‘आपत्तिजनक शब्दावलि का प्रयोग करते हैं, उसका आप समर्थन करते हैं?

सत्यम गुप्त “युवा”- इसका मतलब ये हुआ कि अगर प्रधानमंत्री जी बौखलाहट के साथ आपत्तिजनक शब्दों का इस्तेमाल करते हैं तो इसके विपरीत विपक्ष भी ऐसी शब्दावली का प्रयोग करे ये शोभा नहीं देता है । हम मानते है कि इस लोकतंत्र के शासन में सबको अभिव्यक्ति की आजादी है । लेकिन इसका मतलब ये नहीं हुआ कि अपने ही देश के प्रधान सेवक की खिल्ली खुलेआम उड़ाई जाए । इससे देश और विदेश के लोगों पर क्या फर्क पड़ेगा । लोग सोचेंगे कि भारत जैसे देश में भी लोग अपने प्रधानमंत्री की धज्जियां उड़ाने से नहीं थकते हैं । इस छोटी सोच से यह देश कितना आगे बढ़ेगा । जो इज्जत आज भारत की अन्य देशों में हो रही है अगर ऐसे ही विरोधी ताकते प्रधानमंत्री का मज़ाक बनाएंगी तो जो विकास की बात हो रही हैं ये सब बातें धरी की धरी रह जाएंगी और राजनैतिक पार्टियाँ आपसी कलह का शिकार बन जाएंगी ।  देश को आर्थिक, सामाजिक, व्यववहारिक विपत्तियों से होकर गुजरना पड़ेगा और लोगों का सरकार के प्रति विश्वास उठ जाएगा ।

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय- गुप्त जी! आपने अत्युत्तम टिप्पणी की है। अब आप यह बताइए, प्रधान मन्त्री ग़लत वक्तव्य क्यों करेंगे? क्या उन्हें अपने पद की गरिमा का भान नहीं है? किसी भी सर्वाधिक अधिकारों और शक्तियों से सम्पन्न व्यक्ति यदि अपने ही दल के टुटपुँजिये नेताओं के नितान्त अलोकतान्त्रिक वक्तव्यों को रोक पाने में असमर्थ हो तो ऐसे नेतृत्व को आप उकसाने का आचरण नहीं मानेंगे? किस माई के लाल में साहस है, जो देश के मतदाताओं को घसीटते हुए मतदान-केन्द्र तक ले जाकर मनचाहे निशान पर बटन दबवा दे? क्या यह लोकतन्त्र है? प्रधान मन्त्री स्वयं को ‘जनसेवक’ कहते हैं और उनके पिछलग्गू कहते हैं कि प्रधान मन्त्री की बुराई करनेवालों के हाथ तोड़ देंगे, इससे आप सहमत हैं? प्रधान मन्त्री की हर ग़लत नीति की निन्दा और विरोध करने का अधिकार देश के प्रत्येक नागरिक को है।

सत्यम गुप्त “युवा”- हम आपकी बातों से पूरी तरह से सहमत हैं गुरु जी । लेकिन अगर एक व्यक्ति गलत है तो उसकी वजह से पूरी पार्टी का नाम ख़राब होता है ।

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय– हाँ गुप्त जी! मैं आपसे यही कहलवाना चाहता था।

सत्यम गुप्त “युवा”- और एक चीज जो कि सही नहीं है, ऐसा नहीं करना चाहिए कि लोगों को घसीटकर ले जाकर उनसे एक पार्टी को वोट दिलवाया जाये । ऐसा करना बहुत ही निंदनीय कृत्य है । जो ये लोग कर रहे है उनको कड़ी से कड़ी सजा का प्रावधान किया जाना चाहिए । क्योंकि सभी लोगों को मतदान करने का अधिकार प्राप्त है और अपने पसंदीदा प्रत्याशी को चुनने का हक प्राप्त है । रही बात लोगों के हाथ तोड़ने की तो ऐसे नेताओं को राजनीति छोड़ देनी चाहिए क्योंकि ऐसी ओछी बातों से आप नगर में राज नहीं कर सकते हैं और नगर ही क्यों वो देश में भी राज करने की हकदार नहीं है । हमें किसी पार्टी विशेष की बात नहीं करनी चाहिए बल्कि इससे ऊपर उठ कर सोचना होगा तभी देश का विकास संभव है । क्योंकि लोग जो होते हैं बड़े ही स्वार्थी किस्म के होते हैं जिनको जिस पार्टी में फायदा दीखता है उसी पार्टी के हो लेते हैं । ऐसा करना खुद के पैरों के साथ देश की भलाई की राह में रोड़े अटकाना जैसा कृत्य होगा । ऐसा करना समाज के हित के विपरीत है ।

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय- गुप्त जी! दलविशेष की बात करना उचित है क्योंकि जिस दल की बात की जा रही है, उसके अपने और गठबन्धन दलों के कुल सत्रह राज्यों में सरकारें हैं और केन्द्र में भी। ऐसे में, उक्त दिशा में वह दल-विशेष देश के हित में सुधार करना आरम्भ कर देगा तब शेष दल पर सुधार करने के लिए जनदबाव पड़ेगा।

जगन्नाथ शुक्ल- आधुनिक राजनेताओं का नैतिक एवं चारित्रिक पतन चरम पर है, जबकि समाज में इनके आचरण का जनसामान्य पर व्यापक असर पड़ता है। किसी भी व्यक्ति को व्यक्तिगत निन्दित शब्दों का प्रयोग नहीं करना चाहिए, यह गाँधी, नेहरू और शास्त्री जी की राजनीतिक परम्परा का देश है। यहाँ की परिपाटी है कि राजनीतिक प्रतिद्वन्द्विता अपनी जगह और व्यक्तित्त्व सम्मान अपनी जगह; ऐसे तो लोकतान्त्रिक व्यवस्था का क्षरण ही होगा।

आरती जायसवाल- सर! जब अधिकांश अयोग्य, अपराधी, व्यभिचारी और हत्यारे प्रत्याशी बनते हैं और नेता चुने जाते हैं तो भला उनसे सद्व्यवहार, सदविचार और ज्ञानपूर्ण वक्तव्य की आशा करना कहाँ तक उचित है । अपने आचार, विचार और व्यवहार द्वारा सभी राजनीतिक दल और उनके नेतागण दूसरे को नीचा दिखाने और कीचड़ उछालने में स्वयं का बड़प्पन समझते हैं। ऐसे दुर्बुद्धि नेता हमारे ही चुनाव का परिणाम हैं जो आज सरेआम लोकतन्त्र को चुनौती देते हुए नेता की मर्यादा गरिमा और लोकतन्त्र का महत्व भूल चुके हैं। इनके नेत्रों पर अज्ञान और धूर्तता का चश्मा चढ़ा हुआ है । मदान्ध हो ये स्वयं को ईश्वर से कम नहीं समझते । ऐसे में जनमानस ही इन्हें सही आइना दिखा सकता है । आवश्यकता सबको एकजुट और एकमत हो इन्हें उखाड़ फेंकने की । सुपात्र और सही चुनें या फिर ‘इनमें से कोई नहीं ‘चुनें ।

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय- आरती! यही तो प्रश्न है, “बिल्ली के गले में घण्टी कौन बाँधे?” अब उपाय बताओ।

आरती जायसवाल- सर! स्वयं से, परिवार से, गली मोहल्ले से ही शुरुआत करनी होगी । गाँव, कस्बा, वार्ड, नगर से बढ़ते हुए यह स्वतः ही व्यापक रूप ले लेगा । मैं प्रतिबद्ध हूँ ।

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय- हाँ आरती! प्रथम इकाई से ही हमें आगे बढ़ना होगा ।

आरती जायसवाल- हाँ । सर! आभार ।

बद्री पाण्डेय- बिलकुल सही । सर गाली दे लेने से अब बात नहीं बनने वाली। जन सामान्य की भावनाओं को नजरअंदाज या भेदभाव करने वाले राजनेताओं को सबक सिखाने का समय आ गया है। इसके बिना इनकी सोच बदलने वाली नहीं है। राजनेताओं की नजर में आम लोगों की अहमियत एक रोटी के टुकड़े से ज्यादा नहीं आंकी जाती। क्योंकि इस समुदाय में न तो कभी एकजुटता रही और न ही भविष्य में उम्मीद की जा सकती है। इसी का फायदा राजनीतिज्ञ उठा रहे हैं। नहीं तो जन सामान्य लोगों में प्रतिभा और हुनर असाधारण रूप में देखने को मिलती है। सही समय पर सही मंच न मिलने से प्रतिभा का ह्रास होने लगता है। इसके बाद प्रतिभा के धनी लोग लालच के वशीभूत होकर अपने गंतव्य से विमुख हो जाते हैं। इसी का फायदा राजनेताओं को मिलने लगता है। ऐसे समय में आप जैसे महानुभाओं के सानिध्य की बेहद जरूरत होती है। ऐसा मेरा मानना है। चूंकि आप बिना लाग-लपेट के सहज अंदाज में सच्चाई कह देते हैं, जिससे लोगों का अंतःकरण स्वतः बदलने लगता है। मौजूदा समय में आपकी एक पथ-प्रदर्शक के रूप में बेहद जरूरत महसूस की जा रही है। आप ऐसा कर भी रहे हैं। यही वजह है कि हमारे जैसे लोगों का इस बीच खासा मनोबल बढ़ा है। सर आपके संपर्क में आये अभी मुझे कुछ ही दिन हुए हैं, मगर मुझे काफी खुशी होती है कि मैं आप के मार्गदर्शन में हूं। क्योंकि आपसे मैं बहुत कुछ सीख रहा हूं।

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय- पाण्डेय जी! हम विचारपुरुष हैं; हम लाठी-डण्डा लेकर नहीं जा सकते परन्तु शब्दशक्ति से ‘मरणासन्न’ अवश्य कर सकते हैं। हम जनता के उस वर्ग को शब्दबल से जागरूक कर चेतना से सम्पन्न कर सकते हैं ताकि वह ग़लत लोग का खुलकर विरोध कर सके।

बद्री पाण्डेय- बिलकुल सर। यही मेरा भी मानना है।

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय- आपका साधुवाद करता हूँ।

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय- निष्कर्ष/ निष्पत्ति :—–
आप समस्त सम्मानित विचारजीवीगण के स्वाभाविक आक्रोशपूर्ण और समाधानपरक संवाद-प्रतिसंवाद से इतना तो सुस्पष्ट हो ही जाता है

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

कि नेताओं के घिनौने और भड़काऊ बयानात से सभी दुखी हैं और उग्र भी। ऐसा होना भी चाहिए क्योंकि ऐसी स्थिति में चारों ओर से यदि समवेत स्वर उठेगा तब जाकर कहीं घृणित मानसिकतावाले अपने आचरण में सकारात्मक परिवर्त्तन लायेंगे।
देश की जनता को यह भी तय करना पड़ेगा कि वे किसी भी राजनीतिक दल की कथनी-करनी में एकरूपता रहने और लोकहित के लिए किये जानेवाले कार्यों के आधार पर उसका समर्थन करे अन्यथा दूध में गिरी मक्खी की भाँति निकाल फेंके।
आप सभी के उत्साहपूर्ण सहभागिता के प्रति हम कृतज्ञ हैं।

 

Be the first to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published.


*


url and counting visits