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हिन्दी साहित्य सम्मेलन का बौद्धिक परिसंवाद सम्पन्न

हिंदी हैं हम

चित्र-विवरण-- 'स्वातन्त्र्य संग्राम में हिन्दी की भूमिका' विषय पर व्याख्यान करते हुए आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

■ “स्वातन्त्र्य संग्राम में हिन्दी का वर्चस्व देखते ही बनता था”

आज (१४ सितम्बर) ‘हिन्दी-दिवस’ के अवसर पर हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग के तत्त्वावधान में ‘स्वातन्त्र्य संग्राम में हिन्दी की भूमिका’-विषयक एक बौद्धिक परिसंवाद का आयोजन हुआ, जिसमें वक्तागण ने वर्ष १८५७ से लेकर वर्ष १९४७ तक की पराधीनता की अवधि में हिन्दी की प्रभावकारी भूमिका पर बहुविध प्रकाश डाला था।

सम्मेलन के प्रधानमन्त्री विभूति मिश्र ने कहा, “हिन्दी की स्वाधीनता-संग्राम में महत्त्वपूर्ण भूमिका थी, तब भाषा-विवाद से दूर रहकर अहिन्दीभाषाभाषी विद्वानों ने हिन्दी-संवर्द्धन में यथाशक्य योगदान किया था, जो कि स्तुत्य रहा है। आज हिन्दी के नाम पर जिस संघटन का अभाव दिख रहा है, उसकी पूर्ति करना अपरिहार्य बन चुका है।”

तत्कालीन भाषा, पत्रकारिता, साहित्य, संस्थाओं आदिक के योगदान की चर्चा करते हुए, भाषाविज्ञानी और समीक्षक आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय ने कहा, “पराधीनता के दिनों में सभी भारतीयों की स्थिति एक-जैसी थी; सभी का कष्ट और दु:ख एक-जैसा था, इसलिए देश को किसी भी मूल्य पर अंगरेजीराज से मुक्त कराना है, यह भारतीयों का एक स्वर था। इसके लिए हमारी हिन्दी को एक सुदृढ़ स्रोत बनाया गया था। हिन्दी में हस्तलिखित समाचारपत्र निकाले गये थे; देशप्रियता से ओतप्रोत गीत प्रसारित किये गये थे तथा अनेक संस्थाओं के माध्यम से अज्ञात रूप में हिन्दी में क्रान्तिकारिकता का आह्वान करनेवाले संदेश वितरित किये गये थे। इस प्रकार पराधीन भारत के भाल पर हिन्दी ने जो विजयगाथा अंकित कर दी थी, उससे आज हमारी हिन्दी उत्तुंग शिखर प्रतिष्ठित होती दिख रही है।”

अध्यक्षता करते हुए शिक्षाविद् डॉ० रामकिशोर शर्मा ने कहा, “हमारी हिन्दी की आजादी की लड़ाई में जो भूमिका थी, वह हमें आज़ाद कराने में सहायक रही। उन दिनों हिन्दी-समर्थकों का तेवर देखते ही बनता था। राष्ट्रीयता जितनी प्रबल होगी उतनी ही हिन्दी विस्तृत होगी।”

सम्मेलन के अर्थमन्त्री रमानिवास पाण्डेय ने कहा, “हिन्दी ने स्वाधीनता संग्राम में जो योगदान किया है, वह अविस्मरणीय है।”

साहित्यकार विवेक सत्यांशु ने कहा,”हिन्दी हमारी अस्मिता और अस्तित्व की पहचान है।”

साहित्यकार देवी प्रसाद कुँवर ने हिन्दी-शब्दों की विविधता पर प्रकाश डाला। इनके अतिरिक्त अन्य वक्ताओं ने विचार व्यक्त किये थे।

इस अवसर पर डॉ० पूर्णिमा मालवीय, डॉ० वीरेन्द्र तिवारी, डी० एन० सारस्वत, डॉ० पीयूष मिश्र, चन्द्रप्रकाश पाण्डेय आदिक प्रबुद्धजन उपस्थित थे।

समारोह का संयोजन सम्मेलन के प्रबन्धमन्त्री कुन्तक मिश्र ने किया और शेषमणि पाण्डेय ने संचालन।