लम्हा-दर-लम्हा जो संग-संग चलता रहा, बूढ़ा समझ हम सबने घर से निकाल दिया

 डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय-

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
(प्रख्यात भाषाविद्-समीक्षक)

एक : लम्हा-दर-लम्हा जो संग-संग चलता रहा,
बूढ़ा समझ हम सबने घर से निकाल दिया।
दो : कितना निष्ठुर दस्तूर है ज़माने का,
काम निकल आने पे घूरे में डाल आते हैं।
तीन : मेरी यही ख़ता, कोई ख़ता न कर सका,
काश! कुछ दिल और दिमाग़ से किया होता।


कुछ शेर और-


एक : चादर पुरानी छोड़कर, नयी ओढ़ी है अब,
नज़दीक से देखता हूँ तो पैवन्द हैं जड़े।
दो : उनकी रंगीनीयत के क्या कहने,
ख़ुदा ख़ुद से जुदा हो देख रहा।
तीन : हमारे शहर की तहज़ीब क्या निराली है,
टुकड़े देने के बाद भी ‘कुत्ते’ भौंका करते।

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