जफ़ापरस्त की उम्र होती है बहुत

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय-


एक : खोकर जीने का मज़ा कुछ और ही है यारो!
कामयाबी की मनाज़िल (१) यों ही हासिल नहीं होतीं।
दो : आँखों में आँसू, लब पे हैं दुवाएँ,
इन्तिज़ार उनका, आयें या न आयें।
तीन : भले लुट जाये काइनात(२) अपनी,
जफ़ा वफ़ा से दूर नहीं जायेगी।
चार : जफ़ापरस्त(३) की उम्र होती है बहुत,
वफ़ापर्वर(४) फ़ासलों में जीते नहीं।
पाँच : वफ़ाशनासी(५) वफ़ाशिकन पहचान नहीं पाते,
जिधर देखो चेहरे, चेहरा पर जड़े दिखते हैं।
छ: : ज़रीर(६) ज़रीह(७) है और ज़रीस(८) भी,
ज़रीह(९) पर बैठा ज़रीमा(१०) अपना पूछ रहा।


१- मंज़िल का बहुवचन २- संसार ३- अनीतिपोषक ४- प्रेमपुजारी ५- प्रेमपारखी ६- अशक्त ७- आहत ८- क्षुधातुर ९- समाधि १०- अपराध


चन्द शेर और…


ज़ुल्फ़ों में छुपी, घटा की जवानी,
फ़ज़ा में घुली है हवा की रवानी।
बागवां ! न कलियों से खेला करो,
यहीं से उठी दर्दे दिल की कहानी |

(सर्वाधिकार सुरक्षित : डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय)

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