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माया : एक अनुशीलन

आत्मिक संदेश

★ आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

यह संसार अशरीरी से संत्रस्त है। निदर्शनस्वरूप प्रथम स्थान ‘माया’ का है और द्वितीय स्थान ‘कामदेव’ का। माया और अनंग (कामदेव) की सर्वत्र व्याप्ति है। दोनों का अस्तित्व ‘दृष्टि’ का विषय नहीं है, प्रत्युत ‘अनुभव’ का है और दोनों ही ‘भोग्य’ हैं, जो भोक्ता को प्रतिपल आकर्षित किये रहते हैं। अपराध के मूल में दोनों की जड़ें इतनी गहरी हैं कि वहाँ तक पहुँच पाना किसी के भी वश में नहीं है।

कबीर की मायाविषयक रचनाएँ ‘माया’ का सांगोपांग चित्रण करती हैं। एक हठयोगी माया का विस्तार करता है तो संकुचन भी; माया का मण्डन करता है तो खण्डन भी।

“माया तजी तो क्या भया, मानि तजी नहिं जाय।” कहनेवाले कबीरदास ने माया को जितना समझा था उतना किसी ने नहीं, तभी तो वे ‘बेधड़क’ बोल पड़ते हैं, “माया महाठगनी हम जानी।”

वे ‘माया’ की गवेषणा करते हुए कहते हैं, “माया मुई न मन मुवा, मरि-मरि गया सरीर।”

नासमझ संसारी लोग के लिए उनका यह कहना एक प्रकार का जागरण-संदेश है, “कबीर माया मोहनी, जैसो मीठी खांड।”
यदि ‘माया’ शब्द को दो भागों में विभक्त करते हैं तो ‘मा’ और ‘या’ की प्राप्ति होती है, जो वास्तविकता से अवगत कराने के लिए पर्याप्त है। ‘मा’ का अर्थ ‘नहीं’ (निषेध) है और ‘या’ का ‘जो’ है। अब ‘माया’ का अर्थ हुआ, ‘जो नहीं है’। इस प्रकार जो है ही नहीं; जिसका अस्तित्व ही नहीं है, वह ‘माया’ है। दूसरे शब्दों में– माया एक प्रकार की ‘मृगमरीचिका’ है।

कामदेव भी दिखता नहीं; परन्तु अनंग-रूप में जगत् को वशीभूत किये रहता है।

ऐसी स्थिति में, जीवन जीने की ‘सात्त्विक कला’ विकसित करनी होगी, जो ‘तेरा-मेरा’ से परे रहे और आचरण की सभ्यता के रूप में परिलक्षित भी होता रहे।

(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; २२ फ़रवरी, २०२१ ईसवी।)

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