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आज ८ मार्च है– अन्तरराष्ट्रीय महिला दिवस : परम्परा का तक़ाज़ा जो है

पृथ्वीनाथ पाण्डेय :

नारी-समाज में और नारी-समाज के प्रति जागरूकता आज बढ़-चढ़कर दिख रही है। आज के समाचार-चैनलों और कल के अख़बारात में परम्परा का भराव दिखेगा और ९ मार्च के बाद से अगले ७ मार्च तक ख़ामोशी छायी रहेगी, श्मशानघाट और क़ब्रगाह की तरह से।

“आ बैल! ले मार” को चरितार्थ करनेवाला संवैधानिक अधिकार ‘लिव-इन रीलेशन’ भारतीय विधान की हवा निकाल रहा है।

नारी का मान-मर्दन करनेवाले खुली हवा में साँस ले रहे हैं और सामाजिक व्यवस्था के अत्याचार की शिकार महिलाएँ अँधेरे में गुमसुम पड़ी हुई हैं और समाज का एक वर्ग खायी-अघायी महिलाओं की पद-प्रतिष्ठा कर ‘चार सौ बीस’ इंच का सीना ताने खड़ा दिख रहा है। महिला का ‘काल’ बनती महिला के चरित्र-चाल-चेहरा और ‘त्रिया चरित्र’ पर भी आज का ८ मार्च टुकड़े-टुकड़े में रौशनी फेंकता नज़र आ रहा है और सावधान कर रहा है– नज़रिये को सँभाल कर रखिए, कहीं लचक न जाये; बल खाने की आशंका बलवती है। जनाब! इज़्ज़त बहुत सस्ती है; देश की हर गली में इज़्ज़त ‘उतारने’ और ‘उतार कर चढ़ाने’ की दुकाने चौबीस घण्टे खुली रहती हैं।

वाह रे कुम्भकर्णी भारतीय समाज…………….!..?

(सर्वाधिकार सुरक्षित : पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; ८ मार्च, २०२० ईसवी)

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