युवा कहानीकार आरती की कथाकृति ‘परिवर्त्तन अभी शेष है’ लोकार्पित

आरती की कहानियों में मनोरंजन है और मानसिक तृप्ति भी : डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

“कृतिकार आरती जायसवाल एक है, परन्तु उसके रूप कई हैं। इस सैंतीस वर्षीया के भीतर चार वर्ष की शिशु से लेकर अस्सी-नब्वे वर्ष तक की वयोवृद्ध-वयोवृद्धा का मनोविज्ञान भरा हुआ है। वह एक शरीर में कई मन-मस्तिष्क को लेकर चलती है। यही कारण है कि कहीं उपेक्षिता, परित्यक्ता, प्रतिकारी, पथभ्रष्ट, निरभिमानी, तो कहीं सहज जिज्ञासु, स्निग्धा सौम्या, सुशीला, उदारमना, कर्मयोगी के रूप में अपनी कहानियों के माध्यम से ‘अर्द्धनारीश्वर-सदृश’ प्रत्यक्ष होती है, जो एक निष्णात कथाकार की महत्ता है और किसी रचनाशीलता की पाठकप्रियता भी।”
उक्त उद्गार सारस्वत समारोह के मुख्य अतिथि भाषाविद्-समीक्षक इलाहाबाद से पधारे डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय ने युवा कथाकार आरती जायसवाल की सद्य:- प्रकाशित कथा-कृति ‘परिवर्त्तन अभी शेष है’ के २७ मार्च, २०१८ ई० को रायबरेली में आयोजित लोकार्पण-उत्सव के अवसर पर व्यक्त किये थे।
अपनी अभिव्यक्ति को गति देते हुए, डॉ० पाण्डेय ने कहा,”जब सर्जनधर्मी अपने कथा-संसार में भिन्न-भिन्न विचार-आचरणवाले पात्रों का सर्जन करता है तब उसे अपने मूल चरित्र को भूमिगत कर, कथानक की आवश्यकतानुसार एक-एक पात्र की गतिविधियों का सूक्ष्मता के साथ निरीक्षण-परीक्षण करते हुए, उन्हें स्वयं के भीतर प्रवेश कराकर ‘परकाया-प्रविष्टि’-कला को सिद्ध करना पड़ता है। कहानीकार ने संग्रह की सभी कहानियों में इसका प्रत्यक्षीकरण किया है। यही कारण है कि आरती की कहानियों में मनोरंजन है और मानसिक तृप्ति भी।”
इससे पूर्व मंचस्थ अतिथिगण ने दीप-प्रज्वलन और सरस्वती के चित्र पर माल्यार्पण किया, तत्पश्चात् कहानीकार आरती ने मंगल-स्तुति और सरस्वती-वन्दना कर सभागार को सारस्वतमय बना दिया।
सारस्वत समारोह के मुख्य अतिथि डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय ने युवा कथाकार श्रीमती आरती जायसवाल की कथाकृति ‘परिवर्त्तन अभी शेष है’ का लोकार्पण किया, जिसका साक्षी आरती के माता-पिता, स्वजन-परिजन ने भी दिया, जो आह्लादकारी था और परिवेश को आत्मीय रूप देनेवाला भी।
विशिष्ट अतिथि विदुषी डॉ० किरण शुक्ल ने प्रत्येक कहानी की विषयवस्तु को वर्तमान परिप्रेक्ष्य में प्रासंगिक बताते हुए कहा, “हम अपने आस-पास की समस्याओं को जिस रूप में देख रहे हैं, उनका निदान नहीं कर पा रहे हैं, परन्तु उन समस्याओं को अपनी कहानियों के माध्यम से आरती ने उठाया है और उनका निराकरण भी किया है। कहानीकार ने समाज को जाग्रत करने का सराहनीय प्रयास किया है। प्रत्येक पात्र की मानसिकता के द्वन्द्व का स्वाभाविक चित्रण किया है।”
एक अन्य विशिष्ट अतिथि आचार्य रजनीकान्त वर्मा ने विस्तारपूर्वक विश्लेषण करते हुए कहा, “प्राय: देखा गया है कि रचनाकार अपने संग्रह के अन्तर्गत सम्मिलित किसी एक कहानी को ही संग्रह का नाम दे देता है, जबकि आरती ने सभी कहानियों के भावों के आधार एक शीर्षक ‘परिवर्त्तन अभी शेष है’ देकर एक नया कार्य किया है।”
डॉ० परमानन्द मिश्र के अनुसार, “प्राचीन से अर्वाचीन तक कहानीगत विषयवस्तु का चित्रण है। कथाएँ अन्त तक पाठक को बाँधे रखती हैं।”
इनके अतिरिक्त आनन्दस्वरूप श्रीवास्तव, अरविन्द जायसवाल, चन्द्रप्रकाश शुक्ल, देवेन्द्र पाण्डेय, दिनेश मिश्र, जय चक्रवर्त्ती तथा राम सनेही ने विचार प्रकट किये थे।
कहानीकार आरती जायसवाल ने अभ्यागतगण से आशीर्वचन की अभिलाषा करते हुए अपनी नमनीयता प्रकट की। सूर्यनारायण दुबे ‘सूरज’ ने अध्यक्षता की।
समारोह के संयोजक अनित जायसवाल की इस आयोजन में महती भूमिका रही। डॉ० सन्त लाल ने प्रभावपूर्ण संचालन कर, स्वयं की कारयित्री प्रतिभा सिद्ध की।

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