ज़िंदगी अब इक तंज़ बन के रह गई

October 5, 2018 0

ज़िंदगी अब इक तंज़ बन के रह गई बिन तेरे दुनिया रंज बन के रह गई । नाख़ुदा कौनसी स्याही से मानेगा अश्कों का रंग भी अब सुर्ख़ हो गया । बिखर गया हूँ कुछ इस तरह से कि इक टुकड़ा फलक पे दुसरा ज़मीं-दोज़ हो गया । रह रह के देखता हूँ मुड़ के पीछे बवंडर लूट के मुझे ख़ामोश हो गया । डॉ. रूपेश जैन ‘राहत’