सई नदी की करुण कथा : पौराणिक और ऐतिहासिक नदी मर रही है

एक कवि का दृष्टिबोध

January 2, 2018 0

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय- पसीने से हो तर-ब-तर, हवा चलती रही बेक़द्र। सूरज मद्धिम हो रहा, दीये-बाती-सा जलकर। गुस्ताख़ियाँ बूढ़ी हो रहीं, साल का ख़त्म एक सफ़र। आगाज़ अंजाम से यों बोला, ”तूने बरपाये बहुत क़ह्र। […]