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अफग़ानिस्तान हारा या फिर सत्ता सौंप दी?

★ आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

१५ अगस्त, २०२१ ई० की तिथि भारत के लिए आज़ादी की रही है, जबकि उसके विपरीत, अफग़ानिस्तान के लिए ग़ुलामी का रहा है। १५ अगस्त को अफग़ानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ़ ग़नी असमद ज़ई ने काबुल पर तालिबानियों का अधिकार हो जाने के बाद पराजय को गले लगाते हुए, त्यागपत्र देने के बाद तालिबानी नेताओं को गले लगाकर यह सिद्ध कर दिया है कि अफग़ानी राष्ट्रपति ने तालिबानियों को सहर्ष सत्ता सौंप दी है। तालिबानियों के द्वारा काबुल पर इतनी शीघ्रता से अधिकार कर लेना, आसान नहीं लग रहा था; लेकिन अपनी नपुंसकता का परिचय देते हुए, अब्दुल गनी ने अपने सैनिकों को समर्पण करने के लिए बाध्य किया था। यही कारण है कि अफग़ान के सेना-प्रमुख तथा अन्य अधिकारियों ने तालिबानी फ़ौज के सामने आत्मसमर्पण कर दिये थे। अफग़ानिस्तान के गृहमन्त्री ने समर्पण कर दिया था। जिस राष्ट्रपति ने कहा था– हम तालिबानियों के विरुद्ध अन्तिम समय तक संकल्पबद्ध होकर लड़ते रहेंगे, उसी ने ऐन मौक़े पर अपनी शत्रु-सेना के सामने घुटने टेक दिये हैं।

अब प्रश्न है, संयुक्त राज्य अमेरिका और रूस मुखर होकर क्यों नहीं आ पाये थे? संयुक्त राज्य अमेरिका का ‘नैटो’/’नाटो’ हाथ-पर-हाथ धरे क्यों बैठा रहा? चीन और पाकिस्तान के कुचक्रों के परिणामस्वरूप जिन तालिबानियों के उग्र रूप दिखे हैं, वे वैश्विक वातावरण को अशान्त बनाये रखने के लिए पर्याप्त हैं। क्या तालिबानियों के सम्मुख विश्व के देश नतमस्तक होकर उसे मान्यता देंगे?

तालिबानियों को शासन करने का अनुभव नहीं है, इसे वे अच्छी तरह से जानते हैं। यही कारण है कि सत्ता में भागीदारी करने के लिए अफग़ानिस्तान के पूर्व-राष्ट्रपति और अन्य नेताओं को आमन्त्रित किया है।

उल्लेखनीय है कि अली अहमद जलाली नामक अफग़ानी राजनयिक ने अफग़ानिस्तान के विरुद्ध साज़िश रची थी। वह अफग़ानिस्तान का गृहमन्त्री रह चुका है; जर्मनी में अफग़ानिस्तान का राजदूत के पद पर काम भी कर चुका है। तख़्तापलट करने के उद्देश्य से उसने ५० हज़ार अफग़ान नेशनल पुलिस का गठन कर उसे तालिबानियों के साथ जोड़ा था, जिससे तालिबानी आक्रामक होकर अफग़ानिस्तान पर चढ़ाई कर बैठे और अब अफग़ानिस्तान अपने मूल स्वरूप को छोड़कर ‘तालीबानी’ रंग-रूप इख़्तियार (‘अख़्तियार’ अशुद्ध शब्द है।) कर चुका है। ऐसे में, वहाँ की महिलाओं को खुले वातावरण में श्वास लेना दूभर हो जायेगा, यद्यपि तालिबान-प्रमुख ने कहा है कि वे महिलाओं को आज़ादी देंगे; बदनाम तालिबानी कृत्यों से दूर रहकर अफग़ानिस्तान की जनता के हित में काम करेंगे। यह भी सूचना दी जा रही है कि अफग़ानिस्तान के पूर्व के ही मन्त्रिमण्डल को लेकर चलेंगे। यदि सत्ता पाने के बाद तालिबानी अपना चरित्र बदलते हैं तो यह एक सुखद सूचना होगी। इसका एक कारण यह भी हो सकता है कि तालिबानी ऐसा सकारात्मक कथन कर विश्व के देशों से अपने पक्ष में समर्थन पाना चाहते हों।

बहरहाल, अब तालिबानियों ने घोषणा कर दी है– हमारा पूरे अफग़ानिस्तान पर क़ब्ज़ा हो चुका है। दूसरी ओर, अफग़ानिस्तानवासी काबुल से बाहर निकलने के लिए छटपटाने लगे हैं; क्योंकि तालिबानी चरित्र से सभी अवगत हैं। वे सभी यह जान चुके हैं कि उनके देश की सेना ने तालिबानियों के साथ समझौता कर अफग़ानिस्तान को ग़ुलाम बनने के लिए छोड़ दिया है। यही कारण है कि काबुल में अफग़ानी जनता ने अफग़ानी सैनिकों पर जूते-चप्पलें फेंकी थीं।

बहरहाल, अब स्थिति अति शोचनीय है। कल कैसा होगा, भविष्य के गर्भ में है।

(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; १५ अगस्त, २०२१ ईसवी।)