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दो लोगों के शब्द आज भी प्रासंगिक है, पहले सावरकर और दूसरा 1971 में दिया गया अटल जी का भाषण

कमलेश चंद्र तिवारी जी की फेसबुक वॉल से-


दो लोगों के शब्द या सोच आज भी प्रासंगिक है पहले सावरकर और दूसरा अटल जी का भाषण जो उन्होंने 1971 के युद्ध के बाद संसद में दिया और वो बात आज सच हो रही है ।  1947 के पहले सावरकर जी की जो सोच थी वो आज के दौर में कितनी सत्य है, अवलोकन करें सम्पूर्ण विचार…
26 फरवरी के दिन भारत माँ के महान सपूत वीर सावरकर ने इस संसार को अलविदा कह दिया था।अपने महान तपस्वी जीवन से अनेक अनुभवों को ग्रहण कर युवाओं के लिए वीर सावरकर ने अपनी कलम से जो सन्देश दिए थे वे न केवल आज भी प्रासंगिक हैं अपितु मार्ग दर्शक भी हैं। आज समाज में जो धार्मिक कट्टरवाद फैल रहा हैं, उग्रवाद एवं देशद्रोही ताकते भारत की एकता और अखंडता को चुनौती दे रही हैं। उनका हल वीर सावरकर की लेखनी में मिलता हैं।१. मजहवी धारणा-”सामान्यतः मुसलमान अभी अत्यधिक धार्मिकता और राज्य की मजहबी धारणा के ऐतिहासिक चरण से नहीं उबर पाये हैं। उनकी मजहबी राजनीति मानव-जाति को दो भागों में विभाजित करती है-’मुस्लिम भूमि’ और ‘शत्रु भूमि’ ! वे सभी देश, जिनमें या तोपूर्ण रूप से मुसलमान ही निवास करते हैं अथवा जहाँ मुसलमानों का शासन है, ‘मुस्लिम देश’ हैं और अन्य देश ‘शत्रु देश’।” (सावरकर एण्ड हिज टाइम, पृ. २३०)
२. मुस्लिम धर्मान्धता-”पारसी-ईसाई आदि भारत के लिए कोई समस्या नहीं है। जब हम स्वतन्त्र हो जायें तब इन्हें बड़ी सरलता से हिन्दी नागरिक की श्रेणी में लाया जा सकेगा। किन्तु ुसलमानों के बारे में बात दूसरी है। जब कभी इंग्लैण्ड भारत से अपनी सत्ता हटा लेगा तब भारतीय राज्य के प्रति देश के मुसलमान भयप्रद सिद्ध हो सकते हैं। हिन्दुस्थान में मुस्लिम राज्य की स्थापना करने की अपनी धर्मान्ध योजना को अपने मन-मस्तिष्क में संजोय रखने की मुस्लिम जगत की नीति आज भी बनी हुई है।’ (३० दिसम्बर १९३९ को हिन्दू महासभा का अध्यक्षीय भाषण)
३. ”मुसलमानों में जात-पांत या क्षेत्रीयता का भाव नहीं है, यह कहना सर्वथा भ्रामक है। दुर्रानी मुसलमान व मुगल मुसलमान, दक्खिनी मुसलमान व उत्तरी मुसलमान, शेख मुसलमान व सैयद मुसलमानों के झगड़े का लाभ उठाकर ही मराठों ने मुगलों का तखता पलटा। शिया और सुन्नी दंगे वैष्णव व शैवों के दंगों से हजार गुणा ज्यादा भयंकर है- और बार-बार होते रहते हैं।
काबुलमें सुन्नी मुसलमानों ने अहमदिया मुसलमानों को पत्थरों से मार डाला। बहाई मुसलमान तो अन्य सभी मुसलमानों को इस दुनियां में फांसी और नर्क के योग्य समझते हैं। अस्पृश्यता भी उनमें कम नहीं हैं। भंगी मुसलमान को पानी भी न छूने देने वाली व मस्जिद में नमाज़ के लिए न जाने देने की घटनायें होती ही रहती हैं।” (मौलाना शौकतअली को लिखे पत्र तीसरा खंड,सावरकर समग्र वांड्‌., पृ. ७५८)
४. मुस्लिम मनोवृत्ति- पिछले पचास वर्षों में, मुसलमानों को प्रसन्न कर व उन्हें एक संयुक्त भारतीय राष्ट्र में सम्मिलित करके कम से कम इस हेतु प्रेरित करने के लिए कि सर्वप्रथम वे भारतीय हैं व फिर मुसलमान हैं, कांग्रेस के प्रयासों का बुरी तरह असफल होने का क्या कारण था ? ऐसा नहीं है कि मुसलमान एक संयुक्त भारतीय राष्ट्र नहीं बनाना चाहते किन्तु एकता, राष्ट्रीय एकता की कल्पना उसके प्रादेशिक एकता पर आधारित नही है। इस विषय पर किसी मुसलमान ने यदि स्पष्ट एवं बोधगम्य रूप से अपना मानस व्यक्त किया है तो वह मोपला आन्दोलन के नेता अली मुसलियार ने हजारों हिन्दू महिलाओं, पुरुषों, बच्चों को धर्मान्तरित करने अथवा तलवार के बल पर समाप्त करने के अति दुष्ट अभियानके समर्थन में उसने घोषित किया कि भारत को एक संयुक्त राष्ट्र होना ही चाहिए और हिन्दू मुसलमान की शाश्वत एकता स्थापित करने का केवल एक ही मार्ग हैं और वह है सारे हिन्दुओं का मुसलमान बन जाना।” (नागपुर में हिन्दू महासभा में अध्यक्षीय भाषण)
५. मुसलमान-मुसलमान, भारतीय कभी नहीं-मुसलमान, मुसलमान प्रथम और अंतिम रूप से मुसलमान रहे, भारतीय कभी नहीं। वे तब तक तटस्थ रहे जब तक कि दिगम्रमित हिन्दुओं ने अंग्रेजी राज से सभी भारतीय के लिए राजनैतिक अधिकार प्राप्त करने का संघर्ष जारी रखा और लाखों की संखया में जेल गये, हजासरों की संखया में अण्डमान गये, सैकड़ों की संखया में फाँसी पर झूल गये और जैसे ही एक ओर कांग्रेसी हिन्दुओं द्वारा चलाये जा रहे निःशस्त्र आन्दोलन एवं दूसरी ओर कांग्रेस से बाहर सशस्त्र हिन्दू क्रान्तिकारियों द्वारा अधिक भयावह एवं प्रवासी जीवन-मृत्यु का संघर्ष चलाये जाने से अंग्रेजी शासन पर पर्याप्त रूप से प्रभाव पड़ा और उन्हें भारतीय को महत्वपूर्ण राजनैतिक शक्ति देने को विवश होना पड़ा, तुरन्त ही मुसलमान चाहरदीवारी से कहने लगे कि वे भी भारतीय हैं, उन्हें भी अपना अधिकार मिलना चाहिए। अंततोगत्वा बातयहाँ तक पहुँची कि भारतवर्ष को ‘मुस्लिम भारत’ व ‘हिन्दू भारत’ में विभाजित करने का प्रस्ताव ज़ोरशोर से रखा गया और इस हेतु मुस्लिम लीग जैसी मुसलमानों का प्रतिनिधित्व करने वाली संस्था ने मुस्लिम राष्ट्रों के साथ हिन्दुओं के विरुद्ध मित्रता करने की तत्परता बताई।” (नागपुर में हिन्दु महासभा में अध्यक्षीय भाषण)
६. वन्द्रमातरम्‌ का विरोध-”मुस्लिम लीग ‘वन्देमातरम्‌’ को इस्लाम विरोधी घोषित कर चुकी है। राष्ट्रवादी कहे जाने वाले कांग्रेसी मुस्लिम नेता भी ‘वन्देमातरम्‌’ गाने से इनकार कर अपनी संकीर्ण मनोवृत्ति का परिचय दे चुके हैं। हमारे एकतावादी कांग्रेसी नेता उनकी हर अनुचित व दुराग्रहपूर्ण मांग के सामने झुकते जा रहे हैं। आज वे वन्देमातरम्‌ का विरोध कर रहे हैं। कल ‘हिन्दुस्थान’ या ‘भारत’ नामों पर एतराज़ करेंगे-इन्हें इस्लाम विरोधी करार देंगे। हिन्दी की जगह उर्दू को राष्ट्रभाषा व देवनागरी की जगह अरबी लिपि का आग्रह करेंगे। उनका एकमात्र उद्‌देश्य ही भारत को ‘दारूल इस्लाम’ बनाना है। तुष्टीकरण की नीति उनकी भूख और बढ़ाती जायेगी जिसका घातक परिणाम सभी को भोगना होगा।” (अहमदाबाद का हिन्दू महासभा काअध्यक्षीय भाषण)
७.हिन्दू का सैनिकीकरण-”जब तक देश की राजनीति का हिन्दूकरण और हिन्दू का सैनिकीकरण नहीं किया जायेगा, तब तक भारत की स्वाधीनता, उसकी सीमायें, उसकी सभ्यता व संस्कृति कदापि सुरक्षित नहीं रह सकेगी। मेरी तो हिन्दू युवकों से यही अपेक्षा है, यही आदेश है कि वे अधिकाधिक संखया में सेना में भर्ती होकर सैन्य-विद्या का ज्ञान प्राप्त करें, जिससे समय पड़ने पर वे अपने देश का स्वाधीनता की रक्षा में योग दे सकें।” (१९५५ में जोधपुर में सम्पन्न हिन्दू महासभाअधिवेशन में भाषण)
८. हिन्दुस्थान नाम का विरोध-”हर एक देश का नाम उसके राष्ट्रीय बहुमत वाले नाम से ही पुकारा जाना चाहिए। क्या कभी बलूचिस्तान, वजीरिस्तान, अफगानिस्तान, तुर्किस्थान आदि नामों पर भी आपत्ति की गयी, जबकि इन देशों में गैर-मुस्लिम अल्पमत बस रहा है ? फिर हिन्दुस्थान या हिन्दू राज्य का नाम लेते ही इनकी साँस क्यों उखड़ने लगती है-जैसे कि उन्हें साँप ने ही काट खाया हो ?” (विनायक दामोदर सावरकर