आइए! विश्व की सातवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थावाले देश भारत की चिन्तनीय आर्थिक दशा पर विचार करें

भाषाविद्-समीक्षक डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

पृथ्वीनाथ पाण्डेय-

वर्तमान में सरकारी क्षेत्रों में न्यूनतम २४ लाख पद रिक्त हैं, जिन्हें सरकार भरना ही नहीं चाह रही है, फलत: अनियोजन (बेरोज़गारी) बुरी तरह से विस्तार करता जा रहा है। निजी क्षेत्रों के देश के औद्योगिक क्षेत्र तथाकथित ‘नोटबन्दी’ के प्रहार से ‘दिव्यांग’ हो चुके हैं। यहाँ का औद्योगिक विकास की गति ह्रास की ओर है। लघु उद्योगों को सरकार की ग़लत नीतियों ने लील लिया है।औद्योगिक विकास में इस समय लगभग २% की गिरावट आयी है, जो भारत की अर्थव्यवस्था के स्वास्थ्य के लिए नितान्त घातक संकेत है। ऐसा इसलिए कि एन०डी०ए०गठबन्धन के सहयोग से गठित सरकार अपने पिछले पाँच वर्षों के कार्यकाल में आर्थिक प्रगति के प्रकरण में ‘हाशिये’ पर रही। इतना ही नहीं, अपने दूसरे कार्यकाल में भी इस विषय के प्रति सरकार अभी तक गम्भीर नहीं दिख रही है। सरकार नकारात्मक आर्थिक नीतियों के कारण देश के औद्योगिक घराने कोई जोख़िम नहीं लेना चाहते।

भारत के परिव्यय (बजट) की जब घोषणा की गयी थी तब बताया गया था कि भारत के ख़ज़ाने में १ लाख ७० हज़ार करोड़ रुपये का घाटा है। उस घाटे की पूर्ति कैसे होगी? जनसामान्य को रोज़गार कैसे मिलेगा? जनसामान्य को अपना कारबार चलाने के लिए बैंकों से सहायता-सहयोग मिल ही नहीं रहा है। बैंक ऋण देने के विषय में अनुदार और निर्मम दिख रहे हैं। इस दिशा में भी देश की सरकार मौन है। इस क्षेत्र में सरकार की नीति सुस्पष्ट हो चुकी है; और वह इस रूप में कि अनेक बैंकों का किसी एक बैंक में विलय कर उन बैंकों का अस्तित्व समाप्त कर दो।

आनन-फानन में कथित नोटबन्दी और जी०एस०टी० का लागू कराना आगे चलकर सरकार के गले की फाँस बनती सिद्ध होती रही है। सरकार की इस अपरिपक्व और लोकघाती निर्णय का जब दुष्परिणाम दिखने लगा तब उसी सरकार को अनेक बार जी०एस०टी० पर विचार करना पड़ा और कई वस्तुओं पर कम करना पड़ा है।

वर्तमान सरकार ने उक्त प्रकार के उपक्रम क्यों किये थे, यह तो सुस्पष्ट हो चुका है। बेशक, सरकार ने अपने ऐसे कृत्यों से अपना ख़ज़ाना तो भर लिया है; परन्तु प्रतिदिन लगभग २५ लाख भूखे पेट सो जानेवाले भारतीय नागरिकों के प्रति हमारी सरकार की संवेदनशीलता नहीं दिखती।

(सर्वाधिकार सुरक्षित : डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; १२ अगस्त, २०१९ ईसवी)

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