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आख़िर क्यों चीख रहा है भारत ? पूछ रहा है भारत !

दीपक श्रीवास्तव ‘दीपू’ :

हम एक ऐसे समाज में रहते है जहाँ का हर काम चाहे वो सामाजिक हो या असामाजिक सिर्फ समाज के द्वारा ही संपन्न होता है ।

कौन सही है कौन गलत है ? ये हम सब मिलकर निर्धारित करते है । किसे क्या खाना चाहिए, किसे कहाँ जाना चाहिए या कहाँ नहीं जाना चाहिए ? ये सब हम सब ही निर्धारित करते है और तो और कौन क्या पहनेगा इसको भी हमने ही निर्धारित करने का ठेका ले रखा है ?

आप किस मंदिर में जा रहे है पूजा करने या आप किस मस्जिद में नमाज़ अदा करेंगे ? ये हमारे खुद के फैसले होते है और हम किस समय किसे क्या प्रतिक्रिया देंगे ये तो हमारा मूलभूत अधिकार है ?

ऐसा मैं नहीं कह रहा ऐसा हमारी सोच कह रही है । परन्तु उस समय हमारी सोच हमारी बुद्धिजीविता को क्या हो जाता है जब हम अपने मुखिया को चुनते हैं । हमारे समाज का कार्यभार कौन देखेगा, इसका निर्णय हम नहीं कर पाते हैं ? जब इन सब पर विचार किया जाता है तब वो तमाम बातें निकलकर आती हैं जो हमारी ओछी मानसिकता को दर्शाती हैं ।

नेता तो अपनी जाति-बिरादरी का होना चाहिए ! यह सही भी है और समाज को इस पर गर्व भी होगा, परन्तु होता इसके विपरीत है । मुखिया जैसे ही चुनाव के बाद चुनकर आता है उसका खेल शुरू हो जाता है । शुरू भी क्यों ना हो ? आखिर हमने ही चुना होता है और हमारे पास यदि कुछ रह जाता है वो है चठिया लगाकर खीसें निपोरना या अपने ही मुखिया की बातों को उजागर करना । उसमें भी दो चार ऐसे होते है जिन्हें अपने चुनाव पर बिलकुल भी शक नहीं होता है और वो अपने प्रतिनिधि का पुरजोर समर्थन करते हैं । फिर संग्राम शुरू होता है । हमारा मनमुटाव शुरू चठिया से होता है और ख़त्म थाना, पुलिस और कोर्ट में । बात यहीं नहीं रूकती आने वाली नस्ले भी प्रभावित होती हैं । इसे वो कहते है “जैसा बोओगो वैसा काटोगे” ।

खैर मुखिया का चुनाव और विरोध अलग बात हुई । हम तो गली में शोहदो का भी बचाव करते है । यकीनन मैंने देखा है । हम अपने ही समाज में फैली हुई गंदगी नहीं साफ़ कर पा रहे है और बात करते है परिवर्तन की । हद है यार !

मेरे काफी मित्र है जो राजनीति में सक्रिय है पर क्या वो सही हैं ? नहीं पता ! क्योंकि मैंने कभी उनका समर्थन नहीं किया और कभी समाज पर चर्चा भी नहीं की । क्योंकि वो क्या थे और मैं क्या था ? ये हम दोनों ही भली भांति जानते है शायद यही सोचकर । उन्होंने कभी चर्चा करना मुनासिब नहीं समझा और ना मैंने राजनीति को तवज्जोह दी ।

अब आते हैं कुछ बहुत बड़े वाले बुद्धिजीवी । वो कहते है आखिर करें तो करें क्या ? आखिर चुने तो किसे ? जो सरकार की तरफ से होगा उसे ही चुना जाये । बिलकुल सही पर आत्ममंथन नाम की भी कोई चीज़ होती है । थोड़ा दिमाग़ पर भी जोर दो । नहीं समझ आता है तो और भी विकल्प होते है उसको सोचो, तब भी नहीं समझ आता है तो फिर मत करो और खुद में एक सरकार बन जाओ ! जो सरकारों का दायित्व है वो निर्वहन करेंगी और आप अपने आस पास के सुधार को स्वयं करो । पर जल्दीबाजी और जाति-धर्म के नाम पर ग़लत का समर्थन और चुनाव न करो तो ही अच्छा
और अगर कर ही रहे हो तो प्रश्न करने का कोई सवाल ही नहीं बनता ।

अब चुनाव में प्रतिनिधित्व करने वालों पर एक नज़र ….

एक नेता जो हेमंत करकरे को आतंकवादी कह जाती है और हम मौन रह जाते हैं, क्यों हमारा खुद का चुनाव है या गुलामी की जंजीरो में जकड़े है ? आखिर क्यों नहीं यह पूछता है भारत !

सभी बुद्धिजीवी बैठे रहते है और एक व्यक्ति आता है महिलाओं के अंगवस्त्रों का विवरण देने लगता और हम सब एक जोक मानकर हँसते हैं और तो और नि:सहाय महिला पर अत्याचार (गेस्ट हाउस कांड) आखिर क्यों ? ये भी पूछता है भारत !

चंद्रशेखर आज़ाद सब जानते है । कोई भी अपरिचत नहीं है आज़ाद जी से । अरे तुम तो सत्ता में आये थे साथ में, जब उसने आज़ाद को आतंकवादी बोला था कुछ तो कहते ।आखिर क्यों मौन रहे ? पूछता है भारत !

सरेआम मंच पर अभद्र भाषा बोलने वाला अपने को अच्छा भी बताता है और आप उसे एक मज़ाक समझकर रख लेते है
आखिर कब तक ? पूछता है भारत !

बहुत से और भी उदाहारण हैं । बताने की जरुरत नहीं । बस आपको सब याद करने की जरुरत है और हाँ मैंने दामिनी देखी थी एक बार रोना आ गया, जो तारीख़ पर तारीख़ की दलीले देता था असल जिंदगी में उसे भी मौन देखा है मैंने । आखिर क्यों जहाँ पैसा है वहीं ये सब अच्छा है या कुछ इंसानियत ज़िंदा है ? पूछता है भारत !

बहुत लम्बी लिस्ट है और फिर आप लोग सब जानते है कुछ न ही कहा जाये । सब हमारी ही नाक के नीचे हो रहा है ।

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