सई नदी की करुण कथा : पौराणिक और ऐतिहासिक नदी मर रही है

तमिलनाडु से आये किसानों के विरोध का तरीका सही नहीं

केवल किसी पर दबाव बनाने के लिए मूत्र पी ले, चूहा खा ले, सांप खा ले, मल खा ले वह व्यक्ति दया का नहीं घृणा का पात्र है

चिदर्पिता गौतम-


न मैं कोई एक्सपर्ट हूँ और न कोई पत्रकार, लेकिन फिर भी इतना बता सकती हूँ, कि तमिलनाडु से आये लोगों का विरोध का तरीका, किसानों का तरीका हो ही नहीं सकता। यह शुद्ध राजनैतिक तरीका है। दिखाया जा रहा है कि किसान पानी की कमी के कारण स्वमूत्र पीने को मजबूर हैं। यह सुनकर, देखकर और पढ़कर मन में शासन के प्रति दुःख और क्रोध का उबाल सा आ जाता है। लेकिन सत्य यह है कि वे सरकार पर दबाव बनाने के लिए ऐसा कर रहे हैं।
जो व्यक्ति केवल किसी पर दबाव बनाने के लिए मूत्र पी ले, चूहा खा ले, सांप खा ले, मल खा ले वह व्यक्ति दया का नहीं घृणा का पात्र है। न केवल घृणा का पात्र है बल्कि खतरनाक है। ऐसा व्यक्ति कभी भी कुछ भी कर सकता है।  आखिरी बात, क्या राज्य में सरकार नहीं है? पहली ज़िम्मेदारी तो राज्य सरकार की है। क्या राज्य सरकार को नहीं पता कि प्रदेश में सूखा है? किसानों को राहत कोष से धन क्यों नहीं दिया जा रहा?  यदि मैं प्रधानमंत्री होती तो या तो ऐसे लोगों से कभी नही मिलती और यदि इनकी मदद करना बहुत आवश्यक हो जाता तो पहले राज्य सरकार को बर्खास्त करके राष्ट्रपति शासन लगाती। लिख लो कि जंतर-मंतर के ड्रामे का निर्देशक कोई नेता नहीं, बल्कि मीडिया निकलेगा।