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यह ‘सरस्वती’ का सम्मान नहीं, ‘अपमान’ है

आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय की पाठशाला

अच्छा लगा था, यह जानकर कि वर्षों से अप्रकाशित ‘सरस्वती’ का पुनर्प्रकाशन होनेवाला है; परन्तु सम्बन्धित आमन्त्रणपत्र में तथ्यों और शब्दप्रयोगों में अक्षम्य दोष देखकर यह सुस्पष्ट हो चुका है कि ‘सरस्वती’ किन लोग के हाथों में चली गयी है। वास्तव में, प्रयागराज से ‘सरस्वती’ पत्रिका का पुनर्प्रकाशन करनेवाले लोग को ‘हिन्दीभाषा’ और ‘साहित्य’ का कितना-कैसा बोध है तथा वे लोग शब्दप्रयोगधर्मिता के प्रति कितने अप्रमत्त हैं? यह पक्ष विचारणीय है। ‘सरस्वती’ के मुखपृष्ठ पर सबसे ऊपर मुद्रित ‘सरस्वती’ की साजसज्जा बदलकर नवागन्तुक सम्पादक और प्रकाशकगण क्या सन्देश सम्प्रेषित करना चाहते हैं? वैसे भी दिल्ली-स्थित ‘सामयिक’ प्रकाशन भी अनेक वर्षों से ‘सरस्वती’ नाम से एक साहित्यिक पत्रिका प्रकाशित करता आ रहा है। ऐसे में, हम किसे वास्तविक ‘सरस्वती’ पत्रिका समझें?

श्यामसुन्दर दास, आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी, पदुमलाल पुन्नालाल बख़्शी-जैसे भाषा के प्रति चैतन्य शब्दधर्मीवृन्द की शब्दसाधना का मर्दन होगा अथवा मण्डन, समय निर्धारित करेगा।

निस्सन्देह, कथित लोकार्पण के अवसर पर आन्तर्जालिक उपस्थिति अंकित कराने के लिए जो ‘आमन्त्रणपत्र’ वितरित किया गया था, उसमें जहाँ कहीं पर ‘हिंदुस्तानी एकेडमी’ अंकित है तो कहीं ‘हिन्दुस्तानी एकेडेमी’ मुद्रित है। इतना ही नहीं, शुद्ध शब्द ‘तत्त्वावधान’ है, जबकि आमन्त्रणपत्र’ में ‘तत्वावधान’ का प्रयोग किया गया है। ‘प्रवेश अंक’ और ‘पुनर्नवा अंक’ का कोई अर्थ ही नहीं होता। शुद्ध शब्दप्रयोग हैं :– प्रवेश-अंक/ प्रवेशांक, पुनर्नवा-अंक/पुनर्नवांक। शुद्ध शब्द ‘अपराह्ण’/’अपराह्न’ है, न कि ‘अपराह् न’। इस आमन्त्रणपत्र का प्रथम वाक्य ही दोषपूर्ण है। संकल्प ‘किया’ जाता है, ‘लिया’ नहीं जाता। “सरस्वती” का यह प्रयोग भी अशुद्ध है; शुद्ध ‘सरस्वती’ है। दो व्यक्तियों के नाम के साथ दो बार क्रमश: प्रधान सम्पादक और सहायक सम्पादक का प्रयोग समझ से परे है। ‘डॉ.’ और ‘प्रो.’ का भी प्रयोग हास्यास्पद है। ‘सन्’ का प्रयोग अशुद्ध है, १९०० ई० होना चाहिए था। जो लोग शुद्ध प्रयागराज’ नहीं लिख सकते, उनसे अपेक्षा करना बुद्धिमत्ता नहीं है। आश्चर्य का विषय है कि ‘सरस्वती’ पत्रिका का पुनर्प्रकाशन करनेवाले लोग अपने आमन्त्रणपत्र में ‘सरस्वती’ पत्रिका को ‘हिन्दी की प्रथम साहित्यिक पत्रिका’ होने की घोषणा कर चुके हैं, जो कि ‘हिन्दी-साहित्यिक पत्रकारिता’ और ‘भारतेन्दु-युग’ के साथ विश्वासघात है अथवा हिन्दी-पत्रकारिता के इतिहास से अनभिज्ञता का परिणाम और प्रभाव है।

‘सरस्वती’ के पुनर्प्रकाशन की झण्डाबरदारी करनेवालों को इस तथ्य का संज्ञान करना होगा कि पहले ‘भारतेन्दु-युग’ आया था और बाद में ‘द्विवेदी-युग’। इस प्रकार ‘सरस्वती’ पत्रिका के प्रकाशन से पूर्व अनेक हिन्दी-साहित्यिक पत्रिकाओं के प्रकाशन हो चुके थे।

उल्लेखनीय है कि ‘सरस्वती’ का प्रकाशन १९०० ई० में आरम्भ हुआ था, जबकि ‘कवि वचन सुधा’ (१८६८ ई०; काशी), हरिश्चन्द मैगजीन’ (१८७३ ई०; काशी), ‘हरिश्चन्द चन्द्रिका’ (१८७४ ई०; काशी), ‘आनन्द कादम्बिनी’ (१८८१ ई०; मीरज़ापुर), ‘हिन्दी प्रदीप’ (१८७७; इलाहाबाद) तथा ‘ब्राह्मण’ (१८८३ ई०; कानपुर) हिन्दी-साहित्यिक पत्रिकाएँ प्रकाशित हो चुकी थीं। ‘सरस्वती’ पत्रिका में अंक हिन्दी में होते थे; किन्तु आमन्त्रणपत्र में रोमन अंक का प्रयोग कर तथाकथित सम्पादकमण्डल कौन-सा सन्देश देना चाहता है?

(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; १७ अक्तूबर, २०२० ईसवी।)

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