सई नदी की करुण कथा : पौराणिक और ऐतिहासिक नदी मर रही है

गमनागमन

● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

साथ-संग चलता रहा, वर्ष-हुआ अवसान।
मन-मंथन मथता रहा, कहाँ मान-अपमान?
घूँघट काढ़े मौन है, अवगुण्ठन-सी देह।
सहमे-सकुचे धर रहे, पाँव-पाँव अब गेह।।
मलय मन्द मुसकान ले, बढ़े जोश के साथ।
जन-जन अगवानी करे, झुका-झुका कर माथ।।
मौसम हरजाई बहुत, चुगली आँखें खेल।
मनमन्दिर मंगल मही१, मुग्ध मुदित मन-मेल।।
कंकड़ कंकण२ कंधनी३,कटितट४ कोमल-रूप।
कलित५ केश कलबल६ मना, क्रियाकलाप अनूप७।।

शब्दार्थ :– १धरती २कंगन ३करधनी ४नितम्ब (कमर का पिछला भाग) ५सुसज्जित ६छल-कपट ७बेजोड़

सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; १ जनवरी, २०२३ ईसवी।)