हे राम! देखिए कहाँ… माँ ने जीवित नवजात को फेंका

आज (९ सितम्बर) ‘भारतेन्दु हरिश्चन्द’ की जन्म-तिथि

हिन्दी-साहित्य के शक्त हस्ताक्षर 'भारतेन्दु हरिश्चन्द'

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
(प्रख्यात भाषाविद्-समीक्षक)

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय


अत्यन्त दुःख-अतीव क्षोभ-महा आश्चर्य तथा अतिशय लज्जा का विषय है कि देश के विद्वान्-अध्येता-शोधकर्त्ता-कर्त्री-साहित्यकार-समीक्षक-अध्यापक तथा सारे पढ़ाकू काव्य में नयी प्रवृत्तियों को लानेवाले सम्मान्य भारतेन्दु हरिश्चन्द का नाम तक नहीं जानते; सभी ‘भारतेन्दु हरिश्चन्द्र’ का प्रयोग करते हैं, जबकि उनका नाम ‘भारतेन्दु हरिश्चन्द’ था।

हिन्दी का नवीन काव्य भारतेन्दु हरिश्चन्द (१८५०-८५) से आरम्भ होता है। वास्तव में, भारतेन्दु प्राचीन और आधुनिक काव्य के सन्धिस्थल पर खड़े हैं। उनका प्राचीन काव्य अतीव विस्तृत है और उसमें हमें सन्त-काव्य, भक्ति-काव्य तथा रीति-काव्य की परम्पराएँ स्पष्टतः लक्षित होती हैं। भारतेन्दु का महत् कार्य यह रहा है कि उन्होंने नव काव्य-धारा का प्रवर्त्तन किया। वस्तुतः आधुनिक काव्य की अनेक नयी प्रवृत्तियों का उदय उन्हीं की रचनाओं में दिखता है और शताब्दी के अन्त तक काव्य में वे प्रवृत्तियाँ स्थायित्व ग्रहण कर लेती हैं। इसी से आधुनिक काव्य के प्रथम चरण को ‘भारतेन्दु युग’ (१८५०-१९००) की संज्ञा दी गयी है।

(सर्वाधिकार सुरक्षित : डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, इलाहाबाद; ९ सितम्बर, २०१८ ईसवी)

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