सई नदी की करुण कथा : पौराणिक और ऐतिहासिक नदी मर रही है

कवि, कहानीकार, उपन्यासकार एवं निबंधकार ‘अज्ञेय’ की आज जयन्ती

Sharwan Kumar

ज्ञानपीठ एवं साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित एवं तीनो ‘तार सप्तक’ के सम्पादक कवि, कहानीकार, उपन्यासकार एवं निबंधकार ‘अज्ञेय’ की आज जयन्ती है ।इसी तिथि 7 मार्च 1911 को इनका जन्म उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले के कुशीनगर में हुआ था ।’शेखर एक जीवनी ‘, ‘नदी के द्वीप’,’अपने -अपने अजनबी , विपथगा’,परम्परा ,’इत्यलम’,’पहले मैं सन्नाटा बुनता हूँ’ आदि इनके प्रमुख संग्रह हैं।इनको याद करते हुए प्रस्तुत है इनकी कुछ कविताएँ—-
साँप!तुम सभ्य तो हुए नहीं-/नगर में बसना भी तुम्हें नहीं आया।/एक बात पूछूँ-(उत्तर दोगे!)/तब कैसे सीखा डँसना-बिष कहाँ से पाया ।

शिशिर ने पहन लिया वसंत का/दुकूल/गंध वह उड़ रहा पराग धूल झूल,/काँटो का किरीट धारे बने देवदूत/पीत-वसन दमक उठे तिरस्कृत बबूल/अरे ऋतुराज आ गया/पूछते हैं मेघ,’क्या वसंत आ गया?’/हँस रहा समीर,’वह छली भुला गया!’/किन्तु मस्त कोपलें सलज्ज सोचतीं/’हमे कौन स्नेह स्पर्श कर जगा गया?’/वही ऋतुराज आ गया ।

सुनो, तुम्हें ललकार रहा हूँ, सुनो/घृणा का गान!/तुम, जो भाई को अछूत कह/वस्त्र बचाकर भागे,/तुम जो बहिनें छोड़ बिलखती,बढ़े/जा रहे आगे!/रुक कर उत्तर दो,मेरा है अप्रतिहत/ आह्वान-/सुनो,तुम्हे ललकार रहा हूँ, सुनो /घृणा का गान!/तुम, जो बड़े बड़े गद्दों पर उँची/दूकानों में,/उन्हे कोसते हो जो भूखों मरते हैं/खानों में,/तुम,जो रक्त चूस ठहरी को देते हो/ जल-दान-/सुनो, तुम्हे ललकार रहा हूँ, सुनो/ घृणा का गान!/तुम,जो महलों में बैठे दे सकते हो/ आदेश, /’मरने दो बच्चे’,ले जाओ खींच पकड़ कर केश !’/नहीं देख सकते निर्धन के घर दो मुट्ठी धान /सुनो, तुम्हे ललकार रहा हूँ, सुनो / घृणा का गान!/………/तुम,सत्ताधारी, मानवता के शव पर आसीन,/जीवन के चीर-रिपु,विकास के/ प्रतिद्वंद्वी प्राचीन,/तुम, श्मशान के देव!/सुनो यह रण-भेरी की तान-/आज तुम्हे ललकार रहा हूँ ,सुनो घृणा का गान!