राजर्षि पुरुषोत्तम दास टण्डन ‘वीतरागी’ कर्मपुरुष थे

आज (१ अगस्त) राजर्षि टण्डन जी की जन्मतिथि है

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
(प्रख्यात भाषाविद्-समीक्षक)

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय


राजर्षि पुरुषोत्तम दास टण्डन जी एक कुशल वक्ता, सन्त राजनेता तथा विदेह-जैसे वीतरागी महामानव थे। वे एक उत्कृष्ट शब्दधर्मी और सम्पन्न विचारक थे। कुछ ही लोग यह जानते हैं कि वे एक उत्तम कोटि के काव्यशिल्पी भी थे। १९०५ ईसवी में इलाहाबाद-निवासी टण्डन जी जब विधि के विद्यार्थी थे तब उन्हीं दिनों अँगरेज़ों का दिल्ली में एक दरबार होनेवाला था। उन्हीं दिनों अँगरेज़ों की भारत-विरोधी नीतियों के प्रति आक्रोशित टण्डन जी ने अँगरेज़ों पर कटाक्ष करनेवाली एक लम्बी कविता की रचना की थी, जिसका शीर्षक था– ‘बन्दरसभा महाकाव्य’।

उनके गुरु और उनके पड़ोसी हिन्दी के लब्ध-प्रतिष्ठ निबन्धकार पण्डित बालकृष्ण भट्ट को वह कविता बहुत पसन्द आयी थी। उन्होंने अपनी हिन्दी-मासिकी ‘हिन्दी प्रदीप’ में २४ जुलाई, १९०५ ईसवी की तिथि अंकित कर, उसे प्रकाशित किया था। भट्ट जी से जब कोई उस कविता के विषय में संवाद करता था तब वे गर्व के साथ कहते थे, ”ऐसी कविता लिखने का साहस पुरुषोत्तम ही कर सकते हैं, जिसके मन में ब्रिटिश शासन के अत्याचार के विरुद्ध विद्रोह की ज्वाला धधक रही है।”
ऐसे महाहुतात्मा को हमारा नमन।

(सर्वाधिकार सुरक्षित : डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, इलाहाबाद; १ अगस्त, २०१८ ईसवी)

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