अभी न होगा मेरा अन्त— निराला (आज निराला की पुण्यतिथि)

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
(प्रख्यात भाषाविद्-समीक्षक)

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय (भाषाविद्-समीक्षक)


इलाहाबाद का नाम आते ही प्रथम पंक्ति में जिस सारस्वत हस्ताक्षर का नाम-रूप दिखता है, वह सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ का है। मेदिनी, पश्चिमबंगाल में जन्म लेनेवाले सूर्य कुमार ने ‘सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ के रूप में इलाहाबाद में अपनी कर्मभूमि बनायी और कर्मयोगी का जीवन जीते हुए, यहीं पर उनकी जीवनलीला भी समाप्त हो गयी। आरम्भ में, उन्हें हिन्दी-ज्ञान नहीं था; किन्तु मात्र १४ वर्ष की अवस्था में मनोहरा देवी के साथ विवाह होना उनके लिए सुखद था। ऐसा इसलिए कि उनकी पत्नी मनोहरा देवी एक सुसंस्कृत और विदुषी थीं और धाराप्रवाह हिन्दी बोलती थीं, जिसे सुन-समझ तथा अनुभव कर सूर्य कुमार की बाँछें खिल गयीं। वे उन्हीं के पास बैठकर वाचन और लेखन-स्तर पर अपनी हिन्दभाषा परिष्कृत करते थे। उन्हीं की प्रेरणा से २० वर्ष की अवस्था में उन्होंने ‘जुही की कली’ की रचना की थी। सूर्य कुमार जब २३ वर्ष की अवस्था में थे तब मनोहरा देवी की मृत्यु हो गयी।

कालान्तर में, वे आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के सम्पर्क में आये। यहीं से वे सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ के रूप में विश्रुत हुए थे। आचार्य ने १९२० ई० में ‘बंगभाषा का उच्चारण’ नामक लेख प्रकाशित किया था। उन्हीं की प्रेरणा से ‘श्रीराम कृष्ण मिशन’ की पत्रिका ‘समन्वय’ का सम्पादन-दायित्व उन्हें सौंपा गया। वहीं उन्हें विवेकानन्द के जीवनदर्शन का बोध हुआ था। ‘सुधा’ का भी उन्होंने सम्पादन किया था। इस बीच, वे इलाहाबाद के तत्कालीन साहित्यकारों-कवियों से जुड़ चुके थे। साहित्यकारगण के आग्रह पर वे १९४२ ई० में इलाहाबाद आ गये थे।
इलाहाबाद में उन्हें सर्जन का अनुकूल धरातल मिला। दारागंज, इलाहाबाद में पण्डे-पुजारी, मल्लाह, यादव, फल-फूल, साग-सब्ज़ी बेचनेवालों के बीच रहते हुए, निराला ‘खाँटी’ निराला बन चुके थे। यही कारण है कि यहीं रहकर निराला ने ‘अपरा’, ‘नये पत्ते’, ‘बेला’, ‘अर्चना’, ‘आराधना’ आदिक काव्यकृतियों और ‘चतुरी चमार’, ‘सुकुल की बीबी’ आदिक कथात्मक कृतियों का प्रणयन किया था।

प्रेमचंद, जयशंकर प्रसाद, आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी, वाचस्पति पाठक आदिक साहित्यकारों के साथ गहरा जुड़ाव उनके साहित्य-संसार को समृद्ध करता था।
महादेवी वर्मा एक प्रकार से उनकी देख-भाल करती थीं। वे राखी के दिन प्रतिवर्ष महादेवी के हाथों से राखी बँधवाते थे। और एक दिन महाप्राण निराला, मतवाला तथा फक्कड़ निराला १५ अक्तूबर, १९६१ ई० को अपने चाहनेवालों को रोता-बिलखता छोड़कर इस दुनिया से कूच कर गये, यद्यपि उनके ‘स्वर’ आज भी साहित्याकाश में गुंजाययमान हैं :–
“अभी न होगा मेरा अन्त,
मेरे ही अविकसित राग से
विकसित होगा बन्धु दिगन्त
अभी न होगा मेरा अन्त।”


(सर्वाधिकार सुरक्षित : डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, इलाहाबाद; १५ अक्तूबर, २०१८ ईसवी)

url and counting visits