भारतीय उपमहाद्वीप के विख्यात पंजाबी शायर :- फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ (जन्मदिवस 13 फरवरी)

राजेश कुमार शर्मा ‘पुरोहित’ (शिक्षक एवं साहित्यकार)-


उर्दू शायरी में आधुनिक प्रगतिवादी दौर की रचनाओं को सबल करने वाले विख्यात पंजाबी शायर फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ थे। सेना ,जेल तथा निर्वासन में जीवन व्यतीत करने वाले शायर फ़ैज़ ने कई नज्म ग़ज़ल लिखी। उन्हें नोबल पुरस्कार के लिए भी नामांकित किया था। जेल के दौरान उनकी लिखी गई कविता जिन्दान नामा को काफी पसन्द किया गया। उनके द्वारा लिखी गई कुछ पंक्तियाँ तो भारत व पाकिस्तान की आम भाषा का हिस्सा बन चुकी है। जैसे कि और भी गम है जमाने मे मोहब्बत के सिवा।

फ़ैज़ का जन्म 13 फरवरी 1911 को सियालकोट में हुआ था। उनके पिता बैरिस्टर थे।उनकी प्राथमिक शिक्षा उर्दू अरबी व फ़ारसी भाषा मे हुई। जिसमें कुरान को कंठस्थ करना भी अनिवार्य था। उन्होंने स्कॉटिश मिशन स्कूल में भी पढ़ाई की। लाहौर यूनिवर्सिटी से अंग्रेजी व अरबी भाषा मे स्नातकोत्तर किया। अमृतसर में व्याख्याता बने। वे मार्क्सवादी विचारधारा से बहुत प्रभावित हुए।

वे प्रगतिवादी लेखक संघ से 1936 में जुड़े। उन्होंने पंजाब शाखा की स्थापना मार्क्सवादी नेता सज्जाद जहीर के साथ मिलकर की। उन्होंने अदब ए लतीफ पत्रिका का सम्पादन भी किया। 1936 से 1948 तक इस साहित्यिक पत्रिका ने काफी प्रसिद्धि पाई। 1941 में उन्होंने छंदों का प्रथम संकलन नक्श ए फरियादी नाम से प्रकाशित किया।

फ़ैज़ ने एक अंग्रेज समाजवादी महिला एलिस जार्ज से विवाह कीट । बाद में वे दिल्ली रहने लगे। ब्रिटिश भारतीय सेना में भर्ती हुए। वे कर्नल के पद तक पहुँचे। विभाजन के समय नोकरी से इस्तीफा देकर लाहौर आ गए। वहाँ जाकर इमरोज व पाकिस्तान टाइम्स का सम्पादन किया। 1942 से 1947 तक सेना में रहे। वे 1951 से 1955 तक जेल में रहे। उन्हें जेल तख्तापलट के जुर्म में दी गई थीं 1962 तक वे पाकिस्तानी कला परिषद में रहे। 1963 में अल्जीरिया योरोप व मध्यपूर्व का भ्रमण किया।1964 में पाकिस्तान वापस लौटे। फ़ैज़ 1958 में स्थापित एशिया अफ्रीका लेखक संघ। के स्थापक सदस्यों में एक थे। भारत के साथ युद्ध के वक़्त वे सूचना मंत्रालय में कार्यरत थे।1978 एशियाई अफ्रीकी लेखक संघ के वे प्रकाशन अध्यक्ष बने।1982 तक बेरूत में कार्यरत रहे।1982 में वापस लाहौर आ गए। गुबार के अय्याम उनका अंतिम संग्रह था।

फ़ैज़ ने आधुनिक उर्दू शायरी को नई ऊंचाई देने का काम किया।साहिर,कैफ़ी,फिराक उनके समकालीन शायर थे।1951 से लगाकर 1955 के इन वर्षों में फ़ैज़ ने कई कविताएं लिखी। दस्त के सबा ,जिन्दान नामा नाम से प्रकाशित हुई। इन कृतियों में फ़ैज़ ने उस वक़्त के शासक के खिलाफ साहसिक लेकिन प्रेम रस में लिखी गई शायरियां हैं।
उनकी शायरी के कुछ अंश देखिए :- आज बाज़ार में जंजीरों में। जकड़े पांवों के साथ चलो।हाथ हिलाते हुए चलो।मस्त हुए नाचते चलो।धूल से भरा हुआ सिर लेकर चलो खून से।लथपथ दामन लेकर चलो।रास्ता देख रहा है वो प्रियतमा के शहर चलो।

उनकी खास काविताओं में है:- खत्म हुई बारिशें संग जिस रोज कज़ा आएगी हजर करो मेरे तन से ख्वाब बसेरा दिले मन मुसाफिर मन, यहाँ से शहर को देखो मंजर सुबहे आज़ादी शीशों का मसीहा कोई नहीं तुम मेरे पास रहो तेरी सूरत जो दिल नशीं की है ऐसी सैंकड़ों कविताएं उन्होंने लिखी।
एम बी इ 1946 में निगार पुरस्कार, उन्हें 1963 में सोवियत रशिया से लेनिन शांति पुरस्कार प्रदान किया गया। 1984 में नोबेल पुरस्कार के लिए भी इनका नामांकन किया गया था।
जेल की मजबूत दीवारें भी फ़ैज़ के विचारों की धार को कमजोर नहीं कर पाई। उनकी कविताओं में पीड़ा और प्रताड़ना से खूब निखार आ गया था।

फ़ैज़ की शायरी भारत ही नहीं पूरी दुनितं में काफी लोकप्रिय हुई। हम मेहनतकश जग वालों से जब अपना हिस्सा मांगेंगे। एक खेत नहीं एक देश नहीं हम सारी दुनिया मांगेंगे। हम सारी दुनिया मांगेंगे।।

उनकी ग़ज़ल के शेर देखिए:-
दिल में अब यूँ तेरे भूले हुए गम आते हैं।
जैसे बिछड़े हुए काबे में सनम आते हैं।।
इक इक कर के हुये जाते हैं तारे रोशन।
मेरी मन्जिल की तरफ तेरे कदम आते हैं।।
और एक ग़ज़ल कस चन्द शेर देखिए:-
कब ठहरेगा दर्द ए दिल कब रात बसर होगी।
सुनते थे वो आएंगे सुनते थे सहर होगी।।
गर बाज़ी इश्क की बाज़ी है जो चाहो लगा दो डर कैसा। गर जीत गए तो क्या कहना हारे भी तो बाज़ी मात नहीं।।

ऐसे लोकप्रिय शायर थे फ़ैज़। जिनकी कलम में गजब की ताकत थी।उनके शेर आज भी लाखों लोगों के दिलों में जिंदा है।

श्रीराम कॉलोनी,भवानीमंडी राजस्थान

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