सई नदी की करुण कथा : पौराणिक और ऐतिहासिक नदी मर रही है

मीडिया विशेषकर न्यूजचैनलों के दोहरे चरित्र और चेहरे का एक और सच

सतीश चन्द्र मिश्र (पत्रकार) की फेसबुक वॉल से-


मूलतः बिहार और पूर्वी उत्तरप्रदेश से प्रतिवर्ष लाखों लोगों द्वारा रोजगार के लिए पलायन दशकों से जारी है. इस पलायन के दो सबसे बड़े पड़ाव पंजाब और मुम्बई/महाराष्ट्र हैं. इसमें से लगभग 90% पलायन रोजगार के साधनों के भयंकर अकाल के कारण भुखमरी की कगार पर पहुंचे लोगों द्वारा ही किया जाता है.
इस शर्मनाक सच्चाई का साक्षी मैं स्वयं रहा हूँ क्योंकि एक पत्रकार के रूप में जालन्धर और चंडीगढ़ में मेरा काफी समय व्यतीत हुआ है और अपने पब्लिकेशन हाउस के जिस गेस्ट हाउस में मैं रहता था वो जालन्धर के इंडस्ट्रियल एरिया में ही था.
बिहार और पूर्वी उत्तरप्रदेश से रोजगार की तलाश में वहां रोजाना पहुँचने वाले दर्जनों जत्थों में शामिल अधिकांश लोगों के पैरों में चप्पलें तक नहीं होती थी. पंजाब की धरती उनकी और उनके परिवार की रोटी की व्यवस्था तो कर ही देती थी. मुझे पंजाब छोड़े हुए लगभग 12-13 वर्ष हो गए हैं लेकिन पंजाब के लिए पलायन की वो रफ्तार थमी नहीं है.
यह बात इसलिए विश्वास के साथ कह रहा हूँ क्योंकि बिहार और पूर्वी उत्तरप्रदेश से पंजाब जानेवाली प्रत्येक ट्रेन लखनऊ होकर ही गुजरती है और उन ट्रेनों में भीड़ का नज़ारा यह होता है कि जनरल डिब्बों में तिल रखने भर की जगह नहीं होती. इसका सीधा सा अर्थ तो यही है कि उत्तरप्रदेश में रोजगार का अकाल आज भी जस का तस है और पंजाब आज भी यहां के लोगों के लिए रोजगार का प्रमुख केंद्र बना हुआ है.
संयोग से दोनों प्रदेशों में एकसाथ ही चुनाव हो रहे हैं. लेकिन मीडिया विशेषकर न्यूजचैनलों का कमाल देखिये कि जिस उत्तरप्रदेश से लाखों लोग रोजगार के अकाल के कारण पलायन कर रहे हैं उस उत्तरप्रदेश का मुख्यमंत्री मीडिया, न्यूजचैनलों के लिए विकास पुरुष, विकास का प्रतीक बना हुआ है किन्तु जो पंजाब उन पलायन करनेवाले लाखों लोगों को रोटी-रोजगार देता है, उस पंजाब का मुख्यमंत्री उसी मीडिया, न्यूजचैनलों के लिए विनाश का प्रतीक है, विनाशपुरुष है.
अकालियों का समर्थक मैं नहीं हूँ लेकिन न्यूजचैनलों के कहने पर मैं उल्लू को कबूतर तो नहीं ही कह सकता.