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पलायनवादी आक्रोश और ‘इन्क़िलाब ज़िन्दाबाद’ का यथार्थ

आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

‘मुक्त मीडिया’ का ‘आज’ का सम्पादकीय

— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

आज जिधर देखिए उधर, ‘पलायनवादी आक्रोश’। चेहरे निस्तेज; हथेलियों की आग बुझी हुई। दिखती है तो नितम्ब-प्रान्त में बाँस डालकर ख़ुद को सबसे अधिक ऊँचाई पर खड़े रहने की थोथी ख़्वाहिश। यही कारण है कि भीड़ में क्रान्ति के मसीहा बने लोग आत्मप्रदर्शन करने के मोह से स्वयं को अलग खड़ा नहीं कर पाते। इस मुरदे देश में क्रान्ति ऐन-मौक़े पर दम तोड़ देती है और लोग अपने जज़्बा को ठगा-ठगा देख, ‘बिना मज़दूरीवाले किराये के टट्टू’ के रूप में अपनी भूमिका पाकर अपने समूचे बदन पर एक पराजित हँसी की लकीरें लपेटे हुए-से नज़र आते हैं।

इन्क़िलाबी अन्दाज़ में खड़ी अवास्तविक भीड़ में ख़ुद को अकेला पाकर एक सच्चा इंसान हवा से भी हलका प्रतीत होने लगता है। चेहरे की रौनक ग़ायब-सी लगने लगती है। हाथों में बेजान शब्दोंवाली वे तख़्तियाँ, जिन पर बेमन से आक्रोशवाले शब्द खींचे रहते हैं; चेहरों पर बेईमान मुसकराहट और होठों पर इन्क़िलाब के मुरदानगी बोल। तासीर ऐसी कि ज़िन्दा इंसान भी मुरदा बन जाये।

आक्रोश की ऐसी परिभाषा खोज कर लानेवाले लोग के मन की आग में इतनी भी ताक़त नहीं रहती कि वे सच्ची रहनुमाई कर रहे लोग को गरमी दे सकें।

आक्रोश और क्रान्ति के लिए हर हथेली पर ‘आग’ होनी चाहिए और चेहरे से टपकता जीवन्त रौद्र रस, जिसे देखते ही रक्त में उबाल आ जाये और आँखों में ख़ून उतर आये।

स्वयं की हस्ती मिटाकर माहौल में अगर ‘इन्क़िलाब’ की आग बोने की हसरत हो तभी आक्रोश और परिवर्त्तन की बात भली लगती है; अन्यथा बेईमानों की मण्डली में जाकर अय्याशी करनी चाहिए।

(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; १४ अक्तूबर, २०२० ईसवी)

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