वाक्य-संरचना में ‘पूर्ण विराम’ का महत्त्व समझें और मनोरंजन करें

प्रख्यात भाषाविद्-समीक्षक डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय-


‘भाषा-परिष्कार-समिति’
केन्द्रीय कार्यालय, इलाहाबाद
यह घटना बलिया ज़िले की है। गाँव ‘रतनपुरा’ है। एक कार्यक्रम के दौरान एक महिला मुझसे मिली थी। वह अर्द्ध-शिक्षिता थी। उसका पति झारखण्ड में कोयलरी (कोयला-कारख़ाना) में काम करता था। वह महिला अपने पति को एक पत्र लिखना चाह रही थी; परन्तु उसे शुद्ध खड़ी बोली और व्याकरण की बहुत ही कम समझ थी। विराम चिह्नों का तो उसे बिलकुल ही ज्ञान नहीं था।

उस महिला ने मुझसे अनुनय-विनय किया था, ताकि उसके पत्र लिखने में मैं उसका सहायक बन सकूँ। मैंने सोचा, पत्र उस महिला से ही लिखवाऊँ और उसमें जो-जो अशुद्धियाँ दिखेंगी, उन्हें उसी से संशोधित भी कराता जाऊँगा; क्योंकि किसी को शिक्षित-दीक्षित करने की यह कलाशैली प्रथम श्रेणी की होती है और यही मेरी शिक्षा-दीक्षापद्धति भी है।

मेरे कई बार कहने पर उस महिला ने पत्र-लेखन करना आरम्भ कर दिया। किसी भी प्रकार का लेखन करते समय वाक्य में पूर्णविराम कहाँ-कहाँ लगता है, इस शब्दानुशासन का संज्ञान उसे नहीं था। यही कारण है कि उसका जहाँ मन करता था, ‘पूर्ण विराम’ का चिह्न (।) लगा देती थी।
उसने चिहुँकते हुए मुझसे पूछा था, “आछा, इ बताइए, अपने उनको (पति) सुरुवा (शुरू) में हम का लिखें?”
मैंने उत्तर दिया, “अरे! इहे लिख दो न, मेरे प्राणप्रिय।”
फिर उसका प्रश्न था,”अरे जी! इ का होता है?”
मैंने झल्लाते हुए उत्तर दिया, “तो लिख दो— मेरे प्यारे-प्यारे भतरू!”

फिर वह बोली, “आ सीधे-सीधे इ काहें न लिख दीं, ” हमार नीमन भतार जी!”
मैंने कहा, “लिख दो।”

उसके बाद मैं वहाँ से यह कहकर कहीं और चला गया— अब हम जाते हैं; शाम को भेंट होगी; फिर तुम्हारा पत्र-लेखन मैं शुद्ध करा दूँगा।

फिर वह बोली,” साम को काहें जी। हेइजा बैठिए; बोरा बिछा दिये हैं; तनी चाह-वाह पीके उठिएगा।”

बहरहाल, उस ‘चकचोन्हर मेहरारू’ से पाला छोड़ाकर मैं चला आया।

शाम को वह अपने भतीजे को मेरे पास भेजी थी। भतीजे के हाथ में दो हाथ लम्बा एक काग़ज़ था। मैं मामला समझ गया।

बड़े-अक्षरों में लिखा गया पत्र था, विराम चिह्नों, विशेषत: ‘पूर्ण विराम’ का समुचित प्रयोग नहीं था। भोजपुरी और खड़ी बोली में पत्र लिखा गया था।

वह पत्र इस प्रकार से था। आप भी पढ़िए आ होठवा में होठवा सटाकर ‘जीला हेलावन’ मुसकी मारिए और इस भजन को होठवा से सहलाते रहिए : आरा हीले, छपरा हीले, ‘बलिया’ हीले ला….
” हमार नीमन-नीमन भातार जी को गोड़ लागती हुं चुल्हिया में डालि के। दूगो कल रोटी सेंकी थी। तबै ना आपकी याद आती है गोइंठा तपाइ के आ खूबै जराइके। फुटेहरी बनायी थी। आप पर खिसियाये हैं। खूबे बाड़का बाबू जी ‘पेन्हा’ गया है। भंइसिया। आ का बतिया है जी आप एको चिठी पतर हमार ‘डीरीम गरल’ (ड्रीम गर्ल) कहि के काहें नहीं लिखते हमारी सहेली फूलमतिया को। मस्टराईन की नोकरी मिल गयी है घास नहीं मिलता है जी हमारी भँइसीया को। पाड़ा हुआ है दादाजी को। आप याद नहीं न करते। दादा जी को और मुझे शराब पीने से फुरसत नहीं मिल रही है। भाई को। तुम तो बोले थे कि हम जरूर जरूर से आयेंगे पर तुम नहीं आये कुत्ते के पिल्ले। भेड़िया खा गया दो महीने का राशन। आते समय ले आना एक खूबसूरत सनीमा की हीरोईन। मेरी सहेली बन गई है। और इस समय टीवी पर गाना गा रही है हमारी बकरी। एक हजार रुपिया में बेच दी गयी है तुम्हारी भौजाई। तुमको बहुत याद कर रही है। पाइंट-बुशर्ट भेज देना। तुम्हारे बड़का भाई को पटीदार ने पटकि-पटकि के सभाखन (बुरी तरह से मारना-पीटना) किया है। चोरों को पकड़ि के।
अब का लिखीं कुकुर। चिल्लाते हैं। रोज-रोज।
तुम्हारी निमनिकी मेहरिया
सरसतिया (सरस्वती)”
बताया जाता है कि यह वह महिला है, जिसे यू०पी० बोर्ड के हाई स्कूल में ९२.९०% और इण्टर में ९१.२०% अंक प्राप्त हुए थे।
(सर्वाधिकार सुरक्षित : डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, इलाहाबाद; १८ जून, २०१८ ईसवी)

url and counting visits