उत्तरप्रदेश लोकसेवा आयोग अथवा उत्तरप्रदेश लोकसेवा ‘भ्रष्टाचार’ आयोग?

जगमोहन यादव के बेटे ने कैसे 'टॉप' कर लिया?

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय


१- महत्त्वपूर्ण परीक्षाओं का परीक्षाओं से पूर्व ‘सार्वजनिक’ (पेपर लीक) हो जाना।
२- प्रश्नपत्रों के अन्तर्गत ‘साक्षात्कार-परीक्षाओं’ में धाँधली।
३- प्रश्नपत्रों में एक ही प्रश्न के लिए ‘अनेक वैकल्पिक’ शुद्ध उत्तरों का उल्लेख।
४- ग़लत प्रकार के प्रश्न और ग़लत उत्तरों को ‘सही’ बताकर उत्तरपुस्तिकाओं का मूल्यांकन कराना।
५- अधिकतर अवकाश-प्राप्त उन अयोग्य अध्यापकों को ‘जुगाड़’ के आधार पर ‘प्राश्निक’ (प्रश्नपत्र तैयार करनेवाला) और ‘परीक्षक’ बनाना, जिनके पास प्रतियोगितात्मक परीक्षाओं का न कोई अनुभव रहता है और न ही उस स्तर पर सम्बन्धित विषय की समझ रहती है।
५- परीक्षा-परिणाम में जातीयता का प्रभाव दिखना।
६- जगमोहन यादव के बेटे ने कैसे ‘टॉप’ कर लिया?
७- अनिल यादव सी०बी०आई० की पूछताछ के डर से क्यों भागा-भागा फिर रहा है?
८- एफ०आई०आर० दर्ज़ कराकर जाँच क्यों नहीं करायी जाती?
९- सुधार की कहीं-कोई गुंजाइश दिखायी ही नहीं देती।
—तो क्या ‘उत्तरप्रदेश लोकसेवा आयोग’ की सकारात्मक भूमिका को सन्दिग्ध पाकर विधानसभा-सत्र में बहस कराकर आयोग को भंग कर देना चाहिए?

(सर्वाधिकार सुरक्षित : डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, इलाहाबाद; २१ जून, २०१८ ई०)

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