आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय की पाठशाला

एक आभासी मित्र के लेखन पर मैने एक टिप्पणी की थी :—
“ध्यातव्य– व्यक्ति का निर्माण कोई नहीं कर सकता; निर्माण केवल ‘कृत्रिम वस्तु’ का होता है।

आप कर सकते हैं– व्यक्तित्व का विकास/संवर्द्धन।”
इस पर उनकी बृहद् (‘वृहद्’ अशुद्ध है।) प्रतिक्रिया प्राप्त हुई थी :–

“प्रणम्य DrPrithwinath Pandey जी,
आपकी टिप्पणी का समादर करते हुए मैंने ‘व्यक्तिनिर्माण’ को संशोधित कर ‘व्यक्तित्व-निखार’ कर दिया। इसके बावजूद मेरे मन में ‘कृत्रिम वस्तु’ से इतर सन्दर्भ में ‘निर्माण’ शब्द के प्रायोगिक औचित्य पर विमर्श की सदिच्छा बलवती हो गई।

  • बचपन से हम पढ़ते आ रहे हैं कि मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता स्वयं है।
  • शिक्षक ही सच्चे राष्ट्रनिर्माता हैं।
  • निर्माणों के पावन युग में
    हम चरित्र-निर्माण न भूलें।
    स्वार्थ-साधना की आँधी में
    वसुधा का कल्याण न भूलें।।
  • गायत्री तपोभूमि, मथुरा की एक मासिक पत्रिका है–‘युग निर्माण योजना’।
  • गायत्री परिवार, मथुरा की लघु पुस्तिका है–‘युग निर्माण सत्संकल्प’।

उपर्युक्त पंक्तियों में ‘निर्माण’ का प्रयोग भौतिक अर्थ में तो नहीं है। मेरी विनम्र जिज्ञासा है कि यथोक्त सन्दर्भ में ‘निर्माण’ का प्रयोग सार्थक है अथवा नहीं? आपके युक्तियुक्त समाधान की प्रतीक्षा रहेगी।

सादर।”
सुयोग्य आभासी मित्र की की जिज्ञासा का प्रशमन (विधिवत् शान्त करना) करते हुए, मैने अधोटंकित टिप्पणी की थी :–
“जैसे– घर का निर्माण, कार का निर्माण, सड़क का निर्माण, रेल-स्टेशन का निर्माण, नदी-पुल का निर्माण इत्यादिक।
● आपने कभी मनुष्य, सन्तान का निर्माण, परिवार का निर्माण, रक्त का निर्माण, पहाड़ का निर्माण, नदी का निर्माण, पौधों-वृक्षों का निर्माण सुना है? यदि सुना है तो वे सभी व्यवहार अशुद्ध हैं।

क्या कभी किसी युग का निर्माण हुआ है? त्रेतायुग का निर्माण सुना है?

बचपन मे हमे बहुत ही अशुद्ध और अनुपयुक्त शब्दज्ञान कराये गये थे। देश की पाठशालाओं मे सृष्टि के आरम्भ के बाद से अब तक स्पर्श व्यंजनो के पंचमाक्षरों के व्यवहार पूर्णत: अशुद्ध पढ़ाये-लिखाये जाते रहे हैं।

देश के विद्वज्जन ‘स्वार्थ’, ‘आतंक’, ‘बलात्कार’ आदिक शब्दों के नितान्त संकुचित अर्थबोध का परिचय प्रस्तुत करते आ रहे हैं, जबकि उनके अर्थविस्तार के प्रति किसी की जिज्ञासा प्रकट नहीं रहती।

शिक्षक राष्ट्र का विकास करता है।
प्रश्न– भारत का निर्माण किस मिस्त्री-मज़्दूर ने किया था?
जो कहता है– नये भारत का निर्माण करेंगे, वह जड़बुद्धि का व्यक्ति है।

निर्माण एकवचन का शब्द है और बहुवचन का भी। आप ‘निर्माणो के पावन युग मे’ का प्रयोग यदि करते हैं तो वह अशुद्ध है।

‘गायत्री-परिवार’ के लोग बहुत ही अशुद्ध शब्द-व्यवहार करते हैं। उस परिवार की पत्रिका के प्रत्येक पृष्ठ मे बड़ी संख्या मे सामान्य अशुद्धियाँ रहती हैं।

‘गायत्री-परिवार’ की दोनो ही पत्रिकाओं के नाम अशुद्ध हैं; दोनो मे सम्बन्धबोधक कारक-चिह्न/ योजकचिह्न/ षष्ठी तत्पुरुष सामासिक चिह्न अलक्षित हैं; ‘निर्माण’ का प्रयोग तो होगा ही नहीं।

यहाँ ‘व्यक्तित्व-निखार’ भी उपयुक्त नहीं है; क्योंकि कोई भी जड़-चेतन तब तक निखार नहीं पाता जब तक वह अपने अस्तित्व मे आ जाता (‘नहीं आ जाता’ अशुद्ध है।), इसलिए आपको पहले अस्तित्व की चिन्ता करनी होगी, तदनन्तर उसके निखार/संवर्द्धन की।

हम प्रत्यक्ष रहते तो प्रश्न-उत्तर, प्रतिप्रश्न-प्रत्युत्तर के द्वारा समस्त शंकाओं का समाधान (समस्या का निराकरण/निदान) कर लिया जाता।

यहाँ मै यदि सामान्य शब्दों का शुद्ध प्रयोग बताना आरम्भ करूँगा तो सभी की आँखें फटी-की-फटी रह जायेंगी। आप ‘सुपात्र’ हैं, इसलिए शब्दविश्लेषण कर गया हूँ।”