सई नदी की करुण कथा : पौराणिक और ऐतिहासिक नदी मर रही है

आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय की पाठशाला

एक वाक्य के आधार पर व्याकरणीय सम्बोध/संज्ञान करें।

वाक्य है :–
हमारे जीवन मे एक ‘तिनके’ की उपयोगिता है और महत्ता भी।

◆ यह वाक्य ‘अनिश्चित वर्त्तमान/वर्तमानकाल/वर्त्तमान/वर्तमान-काल/ वर्तमान का काल/समय (‘वर्त्तमान/वर्तमान काल’ अशुद्ध है।) का है, जिसे हमारे अध्यापकवृन्द पढ़ाते हैं :– ‘प्रेजेण्ट इण्डेफिनिट टेंस’ और विद्यार्थी पढ़ते भी हैं, जबकि ये उच्चारण अशुद्ध हैं; विशेषण के रूप मे शुद्ध उच्चारण ‘प्रेज़ण्ट’ और क्रिया के रूप मे ‘प्रि-ज़ेण्ट’ है। अब हम इसके साथ (यहाँ ‘इससे’ का प्रयोग अशुद्ध है।) जुड़े दो अन्य शब्दों के उच्चारण पर विचार करते हैं। अगले शब्दों के क्रमश: उच्चारण हैं :–
‘इण्डेफ़्इनिट’ और ‘टेन्स’। इस प्रकार शुद्ध उच्चारण होगा :– ‘प्रेज़ण्ट इण्डेफ़्इनिट टेन्स’। यह सकारात्मक वाक्य है।

अब इन दो वाक्यगठन/वाक्य-गठन/वाक्य के गठन (यहाँ ‘वाक्य गठन’ अशुद्ध है। को देखें और समझें :–

प्रथम– ‘हमारे जीवन मे एक ‘तिनके’ की उपयोगिता है और महत्ता भी है।’

द्वितीय– ‘हमारे जीवन मे एक ‘तिनके’ की भी उपयोगिता है और महत्ता भी है।’

इस प्रथम वाक्य मे ‘महत्ता भी है’ का प्रयोग अशुद्ध है; क्योंकि वाक्य के प्रथम पद की क्रिया ‘है’ का उपयोग द्वितीय क्रिया मे निहित है, इसीलिए अन्त मे केवल ‘भी’ के प्रयोग की संगति बैठती है। यहाँ ‘भी’ का प्रयोग इसलिए है कि उपर्युक्त (‘उपरोक्त’ शब्द अशुद्ध है; क्योंकि इस अनुपयुक्त वाक्य का विच्छेदन किया ही नहीं जा सकता।) वाक्य मे यहाँ विचारणीय दो संज्ञा-शब्द हैं :– १– उपयोगिता २– महत्ता।

लगभग सभी पुस्तकों मे अंक-अंकित/अंक के अंकित करने के बाद भी यदि दो और दो से अधिक शब्द-प्रयोग किये जाते हैं तब वहाँ ‘अल्प विरामचिह्न’ (,) का व्यवहार दिखता है; जैसे :– १– रात्रि, २– प्रात:, ३– संध्या। यह अशुद्ध प्रयोग है। यहाँ अल्प विरामचिह्न का सेवन (प्रयोग/व्यवहार) नहीं होगा ; क्योंकि इनमे दिख रहे एक अंक के बाद दूसरे अंक पर पहुँचते ही वाचक (वाचन/पढ़ने करनेवाला) स्वत: ठहरता है। यदि यहाँ पर ‘रात्रि, प्रात: और सन्ध्या’ का प्रयोग शुद्ध है। यहाँ ‘प्रात:’ के आगे ‘और’ का प्रयोग इसलिए होगा कि ‘प्रात:-सन्ध्या’ का व्यवहार एक साथ होता है; ‘प्रात: और रात्रि’ और ‘प्रात: और दिन’ का नहीं, इसलिए यहाँ ‘प्रात: तथा रात्रि’ और ‘प्रात: तथा दिन’ का उच्चारण और लेखन किया जायेगा। हाँ, चूँकि ‘रात्रि-दिवस’ का प्रयोग एक साथ होता है, इसलिए यहाँ ‘रात्रि और ‘दिवस’, ‘निशि और दिवा’ :– रातदिन/रात-दिन/रात और दिन व्यवहृत होगा। यहाँ यह ‘और’-युक्त शब्दयुग्म ‘द्वन्द्व (‘द्वन्द’ अशुद्ध है।) समास’ का उदाहरण है। उर्दू मे उदाहरण को ‘नज़ीर’ कहते हैं, जो कि ‘अरबी-भाषा’ का स्त्रीलिंग-शब्द है।

ऊपर दिख रहे ‘उपयोगिता’ और महत्ता’ के अर्थ भिन्न-भिन्न हैं; अर्थात् ‘यह और यह भी’। कुछ लोग ‘महत्ता’ को ‘महत्तता’, महतत्ता तथा ‘महत्त्वत्ता’ लिखते और बोलते हैं, जो कि अशुद्ध हैं और हास्यास्पद (हँसी उत्पन्न करनेवाला)भी।

अब इसे अँगरेज़ी (‘अंग्रेजी’ अशुद्ध है।) मे समझें।
‘उपयोगिता’ को अँगरेज़ी मे ‘यूटिल्इटि’ (‘यूटिलिटी’ अशुद्ध है।) कहते हैं और ‘महत्ता’ को ‘इम्पॉ:ट्अन्स’ (इम्पार्टेन्स’ अशुद्ध है।)। इन्हें उर्दू (अरबी, फ़ारसी, तुर्की, पश्तो आदिक।) मे क्रमश: ‘इस्तेमाल’ और ‘अहम्मीयत’ (‘अहमियत’ अशुद्ध है।) कहा जाता है। ये दोनो ही शब्द ‘अरबी-भाषा’ के हैं।

ऊपर के ‘द्वितीय वाक्य’ मे दो बार ‘भी’ का प्रयोग ‘द्विरुक्ति-दोष’ के अन्तर्गत आता है, इसीलिए वाक्य के दूसरे पदान्त (पद के अन्त– षष्ठी तत्पुरुष समास) पद+अन्त– दीर्घ स्वरसंधि) मे ‘भी’ लगाकर शुद्ध वाक्य का सर्जन (‘सृजन’ निरर्थक शब्द है; क्योंकि इसकी उत्पत्ति का कोई आधार नहीं है।) करना होगा।
★ शुद्ध वाक्य– हमारे जीवन मे एक ‘तिनके’ की उपयोगिता है और महत्ता भी।

◆ ‘आचार्य पण्डित पृथ्वीनाथ पाण्डेय की पाठशाला’ नामक प्रकाशनाधीन पुस्तक से सकृतज्ञता/कृतज्ञता के साथ/कृतज्ञतासहित/कृतज्ञता-सहित गृहीत (ग्रहण किया गया/लिया गया।)

सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; १ जनवरी, २०२३ ईसवी।)