सई नदी की करुण कथा : पौराणिक और ऐतिहासिक नदी मर रही है

आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय की पाठशाला

यहाँ उन शब्दों के प्रयोग पर सम्यक् विचार किया गया है, जो शुद्ध हैं और उपयुक्त भी। आप उच्चारण और लेखन-स्तर पर उन शुद्ध शब्दों को भक्तिभाव के साथ ग्रहण करते हुए, समाज का भाषिक मार्गदर्शन करें। यहाँ ‘भक्तिभाव’ का प्रयोग इसलिए है कि ‘भक्ति’ का आधार ‘समर्पण’ है और समर्पण के मूल मे ‘श्रद्धा’ और ‘विश्वास’ निहित है। ‘श्रद्धा’ तर्क से परे का विषय है; क्योंकि ‘तर्क’ के समानान्तर ‘कुतर्क’ भी यात्रा करता रहता है।

यहाँ कतिपय ऐसे ही शब्द-प्रयोग पर विधिवत् विचार किया गया है, जो जनसामान्य तक सम्प्रेषित नहीं हो सके हैं।

● प्रावधान-प्रविधान

नियम-संनियम के अन्तर्गत ‘प्रावधान’ का प्रयोग किया जाता है, जो कि निराधार है। ‘प्रावधान’ के स्थान पर ‘प्रविधान’ का प्रयोग शुद्ध और उपयुक्त है।

नीचे सकारण ‘प्रविधान’ शब्द को शुद्ध और उपयुक्त सिद्ध किया गया है।

नियम-क़ानून के भाव मे प्रयुक्त शुद्ध और उपयुक्त शब्द है, ‘प्रविधान’। अब इसका व्याकरणात्मक पक्ष पर दृष्टिनिक्षेपण करें–
प्रविधान– प्र+विधान = प्रविधान।
प्र– यह एक प्रकार का उपसर्ग है, जिसके अर्थ हैं :– श्रेष्ठ, प्रकृष्ट, उत्कृष्ट, विशिष्ट इत्यादिक।)
विधान– नियम। जैसे– विधि-विधान, विधिवत् इत्यादिक।

इसकी परिभाषा है– वह उपाय, जिसके अनुसार काम किया जाता है, ‘प्रविधान’ कहलाता है; जैसे– संविधान मे अपराध को नियन्त्रित करने के लिए ‘प्रविधान’ है।
अब आप ‘प्रावधान’ का अध्ययन करें–
प्रावधान– प्र+अवधान = प्रावधान
प्र– प्रकृष्ट, उत्कृष्ट, विशिष्ट, श्रेष्ठ इत्यादिक।
अवधान– एकाग्र अथवा सावधान होने की अवस्था अथवा क्रिया ‘अवधान’ है। इसे ही ‘मनोयोग’ कहा गया है; जैसे– वह योगी ‘अवधान’ की स्थिति मे दिख रहा है। इसी शब्द से ‘सावधान’ की रचना हुई है– स+अवधान = सावधान।

ऐसे मे, सुस्पष्ट हो जाता है कि ‘प्रावधान’ से ‘नियम-क़ानून’ का न तो भाव प्रकट हो रहा है और न ही अर्थ। इसी अर्थ मे ‘प्राविधान’ का भी व्यवहार किया जाता है, जो कि ‘प्रविधान’ का समानार्थक शब्द नहीं है, इसलिए उसे हम यहाँ अशुद्ध और अनुपयुक्त कहेंगे।

‘प्रविधान’ के अर्थ मे ‘प्राविधान’ शब्द अशुद्ध है।

(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; २५ अप्रैल, २०२२ ईसवी।)