सई नदी की करुण कथा : पौराणिक और ऐतिहासिक नदी मर रही है

आचार्य पण्डित पृथ्वीनाथ पाण्डेय की पाठशाला

◆ यहाँ प्रस्तुत है, एक वाक्य का सम्यक् और अनन्य विश्लेषण।

★ वाक्य है :― पुरुषार्थ से बढ़कर ‘कुछ’ भी नहीं।
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सब कुछ विस्मृत के गर्भ मे विलीन हो जाता है, जबकि पुरुषार्थ ‘अजर-अमर’-रूप/अजर-अमर के रूप मे (‘अजर अमर रूप में’, ‘अजर-अमर रूप में’ तथा ‘अजर अमर के रूप में’ अशुद्ध हैं।) स्थापित हो जाता है। ‘अजर’ विशेषण-शब्द है। यह ‘नञ्बहुव्रीहि’ समास का उदाहरण है। ‘जरारहित’/’बुढ़ापा’ से रहित ‘अजर’ कहलाता है।

प्राय: लोग ‘पुरुषार्थ’ शब्द का प्रयोग करते हैं; परन्तु उसके मूल अर्थ से कुछ ही लोग परिचित हैं। वस्तुत: ‘पुरुष का उद्देश्य’ और ‘लक्ष्य का विषय’ ‘पुरुषार्थ’ कहलाता है। संधि-विचार (संधि के विचार) से यह दीर्घस्वर संधि और समास के विचार से षष्ठी तत्पुरुष समास का उदाहरण है। हम जब ‘पुरुषार्थ’ शब्द का उच्चारण करते हैं तब ‘पुरुष’ और ‘अर्थ’ शब्द का योग दिखता है; अर्थात् ‘पुरुष’ का ‘अर्थ’। यह भी क्रमश: दीर्घस्वर संधि और तत्पुरुष समास का उदाहरण है। यहाँ पुरुष ‘पौरुष’ का प्रतीक है, जिसकी संज्ञा-शब्द ‘पुरुष’ मे ‘अण्’ प्रत्यय के जुड़ने से रचना होती है। अब ‘पुरुष’ शब्द को समझते हैं। इसे स्थानिक बोली मे ‘पुरुख’ कहते हैं। पुरुष ‘पुर्’ धातु का शब्द है, जो ‘आगे जाना’ अर्थ का बोध कराता है। इस धातु मे ‘कुषण्’ प्रत्यय का योग होते ही ‘पुरुष’ शब्द की प्राप्ति होती है। विशेषण-शब्द/विशेषण का/के शब्द (यहाँ ‘विशेषण शब्द’ अशुद्ध है।) पौरुष का अर्थ है, ‘पुरुष से सम्बन्ध करनेवाला’ (सम्बन्ध रखा नहीं जाता, किया जाता है।)। भारतीय समाज मे पुरुष को प्रत्येक स्तर पर सर्वाधिक बलवान् माना गया है, अत: ‘पुरुषार्थ’ का प्रयोग किया जाता है; परन्तु वस्तुत: ‘पुरुषार्थ’ मानवमात्र के लिए व्यवहृत किया जाता है। महारानी लक्ष्मीबाई, रानी दुर्गावती, पन्ना दाई, रज़िया बेग़म, इन्दिरा गांधी इत्यादिक के लिए भी ‘पुरुषार्थ’ का प्रयोग किया जायेगा।

‘पुरुष’ का आपने बोध (ज्ञान/समझ) कर लिया; अब ‘अर्थ’ को समझें।

यों तो (‘यूँ तो’ अशुद्ध है।) अधिकतर/बहुसंख्य (यहाँ ‘अधिकांश’ अशुद्ध है।) लोग ‘क्योंकि’, ‘ज्योंकि’ तथा ‘त्योंकि’ लिखते-पढ़ते तथा कहते हैं, न कि ‘क्यूँकि’, ‘ज्यूँकि’ तथा ‘त्यूँकि’।)

जनसामान्य अर्थ का एक सामान्य ‘अर्थ’ जानते है, जो कि ‘मायने’ के ‘अर्थ’ मे व्यवहृत किया जाता है। हमने ऊपर के वाक्य मे ‘अर्थ’ शब्द का ‘तीन बार’ प्रयोग किया है। वैसे तो जब किसी एक वाक्य मे एक ही शब्द अथवा समानार्थी शब्द का अनेक बार व्यवहार किया जाता है तब वहाँ प्रयोग के आधार पर वहाँ ‘द्विरुक्ति-दोष’ अथवा (वा) ‘पुनरुक्ति-दोष’ उत्पन्न हो जाता है; परन्तु यहाँ वैसा नहीं है।

सामान्य जन ऊपर के वाक्य अर्थ का एक सर्वमान्य ‘अर्थ’ जानते हैं, जो कि ‘मायने’ के ‘अर्थ’ मे व्यवहृत किया जाता है।” मे दिख रहे तीनो अर्थ-शब्द भिन्न अर्थों के रूप मे प्रयुक्त किये गये हैं :― प्रथम ‘अर्थ’ का अर्थ है, ‘शब्द’; द्वितीय का अर्थ ‘मतलब’ तथा तृतीय का अर्थ ‘मायने’ शब्द का अर्थ बता रहा है।

अब हम अपने मूल शब्द ‘अर्थ’ पर केन्द्रित होते हैं। ‘अर्थ’ के अनेक समानार्थी शब्द हैं और भिन्नार्थक भी। आप ‘अर्थ-शब्द’ के पर्यायवाची/समानार्थी शब्दों से पहले ही अवगत हो चुके हैं; अब भिन्नार्थक शब्दों को समझें :― धन-सम्पत्ति, द्रव्य; पञ्च/पंचइन्द्रियों के पंचविषय :― रूप, रंग, रस, गन्ध तथा स्पर्श; जन्मकुण्डली मे लग्न से दूसरा घर।

हमने यहाँ ‘पुरुषार्थ’ (पुरुष+अर्थ) मे जिस ‘अर्थ’ के अर्थ और आशय को ग्रहण किया है, वह है :― अभिप्राय, उद्देश्य अथवा लक्ष्य। इस प्रकार ‘पुरुषार्थ’ का अर्थ ‘पुरुष/मानव का उद्देश्य/लक्ष्य है। इसे आशय की दृष्टि से समझें तो पुरुष अथवा

मानव के जीवन का उद्देश्य ही ‘पुरुषार्थ’ है।

अब अगले शब्द ‘से बढ़कर’ पर विचार करते हैं। यह हिन्दी का शब्द है, जो ‘तुलना’ का बोध कराता है; जैसे― हमसे/तुमसे/उनसे ‘बढ़कर’ कोई नहीं। यह श्रेष्ठतासूचक शब्द है। इसके आगे का शब्द ‘कुछ’ ऐसा विशेषण-शब्द है, जो परिमाण (मात्रा) का बोध कराता है। इसका अर्थ ‘थोड़ा’, ‘ज़रा’ तथा ‘अल्प’ है। ‘कुछ’ सर्वनाम-शब्द भी है, जो ‘कोई’ (वस्तु) का अर्थ बताता है। अब यह प्रयोगकर्त्ता पर निर्भर करता है कि वह किस भाव और अर्थ मे ‘कुछ’ का व्यवहार करना चाहता है। ‘कुछ’ के साथ जैसे ही ‘भी’ का योग होता है, उस ‘कुछ’ का अर्थ और भाव पूरी तरह से बदल जाता है।

‘भी’ शब्द अव्यय है, जिसे ‘अविकारी’ भी कहते हैं। बहुत कम लोग जानते हैं कि ‘भी’ का अर्थ ‘और’, ‘तथा’; अपितु’; ‘अवश्य’ तथा ‘तक’ होता है।

यही ‘भी’ संज्ञा का स्त्रीलिंग-शब्द भी है, जिसका अर्थ ‘भय’/’डर’ होता है। इस वाक्य मे भी ‘भी’ का प्रयोग है, जो कि भिन्नार्थक शब्दों के रूप मे प्रयुक्त है। यही यदि ‘काव्य’ मे व्यवहृत होता तो ‘यमक’ अलंकार का उदाहरण बन जाता। यहाँ दो ‘भी’ हैं; प्रथम का अर्थ ‘यहाँ भी’/’इस वाक्य प्रकरण मे भी’ है और द्वितीय का ‘अव्यय-शब्द ‘भी’ का अर्थ-बोध’ है।

यहाँ पर ‘कुछ’ के साथ लगा शब्द ‘भी’ (कुछ भी) निश्चयात्मक अर्थ का ज्ञान कराता है। यह ‘पुरुषार्थ’ का सर्वोत्तमावस्था बताता है; अर्थात् पुरुषार्थ के सम्मुख कुछ भी नहीं है; पुरुषार्थ ‘अप्रतिम’ है। यदि ऊपर के वाक्यान्त (वाक्य के अन्त) मे ‘पूर्ण विरामचिह्न’/विराम-चिह्न/खड़ी पाई का प्रयोग नहीं किया गया तो वह वाक्य अशुद्ध कहलायेगा; क्योंकि जैसे ही कोई ‘सकारात्मक’ और ‘नकारात्मक’ वाक्य समाप्त होते हैं वैसे ही उनके अन्त मे पूर्ण विरामचिह्न (।) का प्रयोग किया जाता है।

इस प्रकार हमने देखा और समझा कि एक ही वाक्य मे व्याकरण के सभी अंग-उपांग (अंगोपांग) सन्निहित हैं।

◆ आचार्य पण्डित पृथ्वीनाथ पाण्डेय की पाठशाला’ नामक प्रकाशनाधीन कृति से सकृतज्ञता गृहीत (ग्रहण किया गया/लिया गया।)।

(सर्वाधिकार सुरक्षित― आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय; प्रयागराज; १४ जनवरी, २०२३ ईसवी।)