सई नदी की करुण कथा : पौराणिक और ऐतिहासिक नदी मर रही है

आचार्य पण्डित पृथ्वीनाथ पाण्डेय की पाठशाला

◆ वे शब्द, जिनका विश्व-समाज अशुद्ध और अनुपयुक्त व्यवहार करता आ रहा है।
■ शब्दप्रयोग― आभार; शुक्रिय:/शुक्रिया, धन्यवाद, साधुवाद तथा थैंक यू।

आइए! ‘आभार’ शब्द को समझते हैं। ‘आभारी’ का समानार्थी शब्द ‘कृतज्ञता’ है। पढ़े-लिखे लोग बिना सोचे-समझे ‘आभार’ का प्रयोग करते आ रहे हैं; परन्तु वही लोग ‘कृतज्ञता’ का व्यवहार करने से कतराते हैं; क्यों?

‘आभार’-शब्द का जिस भाव और अर्थ मे प्रयोग किया जाता रहा है, वह अशुद्ध है और अनुचित भी। यहाँ तक कि विश्व के विचक्षणवृन्द (विद्वज्जन) केवल ‘आभार’ का व्यवहार करते देखे जाते हैं; परन्तु ‘कृतज्ञता’ का नहीं। आश्चर्य होता है, ऐसे प्रयोग के प्रति विषमता क्यों? ‘आभार’ और ‘कृतज्ञता’ का अर्थ है, ‘किसी के उपकार के लिए व्यक्त की जानेवाली कृतज्ञता/ व्यक्त किया जानेवाला आभार’। ऐसी स्थिति मे, आपको कहना-लिखना होगा :―
१– आभार स्वीकार करें।
२– आभारी हूँ।
३– आपके प्रति आभार-ज्ञापन/आभार व्यक्त/ प्रकट करता हूँ।

यहाँ ‘मै’ का प्रयोग इसलिए नहीं होगा कि ‘मै’ सर्वनाम-शब्द की स्थापना ‘हूँ’ क्रिया करती है; क्योंकि ‘हूँ’ का कर्त्ता केवल ‘मै’ है।

‘आभार’ की तरह ही अरबी-भाषा का शब्द ‘शुक्रिय:’/’शुक्रिया’ है, जिसका अर्थ ‘आभार’ और ‘धन्यवाद’ है। जिसे देखिए, वही बिना सोचे-समझे ‘शुक्रिया’ का व्यवहार करता है, जबकि विशुद्ध शब्द ‘शुक्रिय:’ है। यदि कोई केवल ‘शुक्रिय:’/’शुक्रिया’ का प्रयोग करता है तो वह भी पूरी तरह से ग़लत माना जायेगा। सही प्रयोग होगा :― आपका शुक्रिय: अदा (चुकता/भुगतान) करता हूँ।

‘धन्यवाद’ और ‘साधुवाद’ एक वाक्य हैं, जो कि ‘धन्य हैं विचार अथवा कार्य’ के अर्थ मे प्रयुक्त होता है। ‘उत्तम हैं विचार अथवा कार्य’ के लिए एक शब्द ‘साधुवाद’ भी है, जिसमे से ‘साधुता’ की ध्वनि निर्गत (निकलती) होती है।

आंग्ल शब्द ‘थैंक्स’ की भी स्थिति ‘आभार’ और ‘शुक्रिय:’ से पृथक् (‘पृथक’ अशुद्ध है।)/भिन्न नहीं है। जिसे देखिए, वही बिना सोचे-समझे ‘थैंक्स’ कह देता है, जो कि अशुद्ध और अनुपयुक्त प्रयोग है। इसके स्थान पर कहना पड़ेगा :― थैंक यू। (‘थैंक्यू’ अशुद्ध और हास्यास्पद शब्दप्रयोग है।) यहाँ अन्तर्विरोध लक्षित होता है। पढ़ेलिखे लोग ‘थैंक्स’ कहते हैं और दूसरी ओर ‘थैंक गॉड’ भी। यद्यपि व्याकरण की दृष्टि से ये सभी शब्द-व्यवहार अशुद्ध हैं और अनुपयुक्त भी तथापि प्रचलन मे यही प्रयोग ‘दौड़’ रहे हैं।

हमे भूलना नहीं चाहिए कि ‘भाव’ वा (अथवा) ‘रस’ स्वयं मे बहुवचन होता है; अलग से बहुवचन बनाने की आवश्यकता नहीं है। यदि ऐसा नहीं रहता तो ‘आभारों’, ‘धन्यवादों’, ‘साधुवादों’ तथा ‘शुक्रियाओं’ का व्यवहार किया जा रहा होता।

अब सुशिक्षितजन (‘जनो’ अशुद्ध है।) मे भी ‘संक्षिप्त मार्ग’ (शॉर्ट-कट्) का अनुकरण और अनुसरण करने की होड़ लग चुकी है, जिसका परिणाम और प्रभाव नकारात्मक दिख रहा है। इतना ही नहीं, व्याकरण के अंग-उपांग भी प्रभावित होते दिख रहे हैं और वही ‘मान्य’ भी होता आ रहा है, जो कि ‘शोचनीय’ (‘सोचनीय’ अशुद्ध है।) स्थिति है।

◆ आचार्य पण्डित पृथ्वीनाथ पाण्डेय की पाठशाला’ नामक प्रकाशनाधीन पुस्तक से सकृतज्ञता गृहीत। (लिया गया।)

(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; ६ जनवरी, २०२३ ईसवी।)