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आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय की पाठशाला

हे देश के भावी कर्णधार!

चाहे तुम अधिक व्याकरण न पढ़ो; परन्तु थोड़ा-बहुत पढ़ो अवश्य, जिससे ‘स्वजन’ (प्रिय बन्धु) और ‘श्वजन’ (कुत्तारूपी बन्धु) शब्दों का अनुपयुक्त प्रयोग न कर सको; ‘सकृत’ (एक बार) के स्थान पर ‘शकृत’ (विष्ठा) के प्रयोग करने से बच सको। तुमसे कहीं ‘व्यंग्य’ (कटाक्ष) के स्थान पर ‘व्यंग’ (लँगड़ा) का प्रयोग न हो जाये और अज्ञानवश, ‘परीक्षा’ (जाँच) के स्थान पर ‘परिक्षा’ (कीचड़) का प्रयोग न कर बैठो।

(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; ७ अगस्त, २०२१ ईसवी।)